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बुंदेलखंड विश्वकोश

अक्षर: क

अक्षर 'क' से शुरू होने वाली कहावतें

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कंडी कंडी जोरें बिटा जुरत।

थोड़ा-थोड़ा इकट्ठा करके बहुत होता है।

कड़ी1 मुराई ना मुरे, वरिन खां हाथ पसारें।

(1.कढ़ी, दही और बेसन से बना भोज्य पदार्थ।) कढ़ी तो दाँतों से चबाते नहीं बनती, पकौड़ियों को हाथ फैलाते हैं। छोटा काम तो बनता नहीं, बड़ा काम सिर पर लेना चाहते हैं।

कड़ेरे1 के ब्याव कुँदेरो2 हात जोरत फिरे।

(1.कड़ेरा एक जाति। 2.कुँदेरा एक अन्य जाति जो खराद का काम करती है।) कड़ेरे के यहाँ शादी और कुँदेरा हाथ जोडता फिरता है।

कंत न पूँछे बात मेरो धरो सुहागन नाम।

जब कोई झूठ-मूठ ही अपने को घर के मालिक का विश्वासपात्र बताये या अपने को घर का मालिक कहे तब प्रयुक्त।

कतकी कोंरीं1 टटोउत की करीं।

(1.कोंरी शब्द में श्लेष है। उसका एक अर्थ मुलायम है और पानी में उबाले हुए उन गेंहुओं को भी कोरी कहते हैं जो शादी-विवाह के अवसर पर स्त्रियों को बाँटे जाते हैं।) कहने को मुलायम, पर टटोलने में कड़ी। अर्थात् व्यवहार में मधुर, पर हृदय की कठोर।

कत्थर गुद्दर सोवें, मरजादी1 बैठे रोवें।

(1.मर्यादा वाले, प्रतिष्ठावान्) जिनके पास ओढ़ने को फटे-पुराने चथड़े हैं वे उनमें ही सुख की नींद सोते हैं, परन्तु बड़े आदमी बैठे रोते हैं। इसलिए कि उनके पास कीमती कपड़े नहीं। तात्पर्य यह कि गरीबों का काम थोड़े में चल जाता है, अथवा संतोष बड़ी चीज है।

कथनी से करनी बड़ी।

कहने की अपेक्षा काम करना अच्छा।

कथरी कौ मुड़ायछो1 बाँदें, गुलाल खाँ ठिनके फिरें।

(1.पगड़ी के ऊपर बाँधा जाने वाला दुपट्टा।) कथरी का मुड़ायछा बांध रखा है, और कहते हैं, हम भी गुलाल लगवायेंगे। किसी वस्तु के पाने का उपयुक्त अधिकारी न होने पर भी उसकी माँग करने पर।

कन कन जोरे मन जुरत।

कन कन जोरे मन जुरे, खाते निबरे सोय - वृन्द

कनक न कंडा, कोरे गुंडा।

गाँठ में न आटा है, न ईंधन, शेखी बड़ी बघारते हैं।

कनवाँ से कनवाँ कओ तुरतई जावे रूठ। हराँ हराँ के पूछिये कैसे गई ती फूट।।

काने से काना कहने से वह तुरन्त नाराज हो जाता है। उससे तो धीरे-धीरे पूछना चाहिए कि भाई तुम्हारी यह आँख कैसे फूट गया।

कपड़ा पैरै जग भाता, खाना खैये मन भाता।

वस्त्र दूसरे की रुचि का पहने और भोजन अपनी रुचि का करे।

कपास तौ ओंटबेई कों बनो।

कपास तो ओटे जाने के लिए ही बना है। दीन-हीन तो पीड़ित होने के लिए ही बने हैं।

कपासमल कों तौ कऊँ उटने।

कपास को तो कहीं उँटना। दीन-हीन कहीं भी जायें, सर्वत्र उन्हें कष्ट उठाना है।