अक्षर: ख
अक्षर 'ख' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंखता में खता, डका में ढका।
पीड़ा के स्थान में और भी पीड़ा आकर उत्पन्न होती है, हानि में और भी हानि होती है।
खता1 मिट जात पै गूद बनौ रत।
(1-क्षत, फोड़ा, घाव) फोड़ा भर जाता है परन्तु उसका चिह्न बना रहता है। मन में चुभी बात कभी दूर नहीं होती।
खर1 खाई और कुत्तन जूँठी।
(1-तेल निकाल लेने पर तिलहन की बची हुई पीठी, खली। एक तो खर खाई और वह भी कुत्तों की जूँठी। एक तो अशोभन कार्य किया, वह भी ठीक ढंग से नहीं।
खसम करौ सुख-सारे कों। लग गये झकरा दुआरे कों।।
विवाह तो सुख भोगने के लिए किया, परन्तु उल्टा दुःख माथे आया।
खा खा कें घर पोलौ करो।
खा-खा कर घर खोखला कर दिया। घर के निकम्मे लड़के के लिए कहते हैं।
खाई गकरियाँ गुर घी सें। डुकरा लग गओ हमाय जी सें।।
निकम्मे और बूढ़े आदमी के लिए।
खाईं गकरिया1 गाये गीत। जे भग चले चैतुआ2 मीत।।
(1-हाथ की बनी छोटे आकार की मोटी रोटी, बाटी। 2-चैत की फसल काटने वाले मजदूर, जो फसल के दिनों में झुंड के झुंड बाहर निकलते हैं, जहाँ तक काटने के लिए खड़ी फसल मिलती है आगे बढ़ते जाते हैं और कटाई का काम समाप्त हो जाने पर फिर घरों को लौट जाते हैं।) स्वार्थी अथवा निर्मोही व्यक्ति के लिए प्रयुक्त।
खाओ उतै तौ अचेइयो इतै।
जल्दी आने का आदेश देते अथवा अनुरोध करते हुए कहते हैं।