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अक्षर: घ

अक्षर 'घ' से शुरू होने वाली कहावतें

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घँघरिया की चीलरा1।

(1-चीलर, एक प्रकार का छोटा जुआँ, जो प्रायः गंदे कपड़ों में पैदा हो जाता है। कपड़ों में इसे खोज निकालना बड़ा कठिन होता है।) घाँघरे का चीलर अर्थात् मुसीबत की चीज अथवा मुँह लगा ऐसा आदमी जिससे पिड छुड़ाना कठिन हो।

घटती बढ़ती छाया है।

संसार में सुख-दुख लगा है।

घर कये मोय खोल देख। व्याव कये मोय कर देख।।

घर की मरम्मत और व्याह में सदैव अंदाज से अधिक खर्च होता है।

घर किनईं कों दबा पाओ।

घरवालों को ही दबा पाया। अर्थात घर के लोगों पर ही वश चलता है। बाहर कुछ नहीं कर पाते।

घर की आधी भली।

घर की थोड़ी वस्तु भी बहुत।

घर की खेती।

अनायास पैदा होने वाली वस्तु।

घर की घूँस।

घर में घुसी रह कर चुपचाप माल-मसाले खाने और घर को बर्वाद करने वाली।

घर की मूँछेंई मूंछें हैं।

घर में ऐंठ और अकड़ के सिवा और कुछ नहीं।

घर के घर और बायरें।

घर के घर और बाहर। जब कोई आदमी घर में जैसा काम करे वैसा बाहर भी करना चाहे तब प्रयुक्त।

घर के घरई न समायें ढटिंगर पाउने आये।

जब किसी के घर में इतने आदमी हों कि उनका निर्वाह होना कठिन हो, और ऊपर से बाहर के लोग आ जायें तब कहते हैं।

घर के जान बराते गये, आलीपुरा1 कठवा में दये।

(1-देशी राज्यों के विलीनीकरण के पूर्व की मध्यभारत की एक छोटी रियासत। 2-लकड़ी का मोटा कुंदा या बेड़ी जिसमें अपराधी को दंड देने के लिए उसका पैर फंसा दिया जाता था। अधिकांश देशी रियासतों में उन दिनों जो अंधेरगर्दी और स्वेच्छाचारिता विद्यमान थी कहावत उसका स्मारक है। कोई सज्जन घर वालों के जान तो बरात में गये। परंतु आलीपुरा में वे बिना किसी अपराध के कठवा में फंसा दिये गये। कहने की आवश्यकता नहीं कि कहावत में, आलीपुरा नाम केवल एक प्रतीक के रूप में व्यवहृत हुआ है।

घर के पोरन खों गुर कौ मलीदा।

घर के आदमियों की अपेक्षा बाहर वालों का अधिक आदर-सत्कार करना।

घर कों उसारो, लरके सारो।

घर में आँगन चाहिए और लड़के के साला।

घर कौ कुआ है, तौ का कोई डूब के मरत !

किसी वस्तु का केवल इसलिए दुरुपयोग नहीं किया जाता कि वह घर की है।

घर कौ गुर घरई में फोर लो।

घर की बात बाहर मत जाने दो। चुपचाप काम कर लो।