अक्षर: ज
अक्षर 'ज' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएं: जित्तो खात उत्त (औ) ई ललात।
जितना खाता है उतना ही ललाता है। छोटे लालची बच्चों के लिए।
जगन्नाथ के भात कों जगत पसारे हात।
श्रेयस्कर वस्तु को लेने की इच्छा सभी करते हैं। पुरी जगन्नाथ जी के मंदिर में भात का प्रसाद बँटता है और सभी वर्णों तथा जातियों के लोग प्रेम पूर्वक एक साथ बैठ कर खाते हैं।
जनम कौ कंटक टरौ।
सदा की विपत्ति टली। किसी अवांछनीय व्यक्ति से पिंड छूटने पर।
जनम कौ सब कोऊ साथी होत, करम कौ कोऊ नईं। / जनम भरे में रूप धरौ बोई कोड़ी कौ।
भूले-बिसरे कोई अच्छा काम करने बैठे तो वह भी बेतुका।
जब अपने लरकई में लच्छन नइयाँ तब दायजे की का आसा करत ?
जब अपना लड़का ही निकम्मा है तब दहेज की क्या आशा की जाय ?
जब के बूढ़े अब के ज्वान। अब के हूँहें और निकाम।।
पुरानी पीढ़ी के बूढ़े लोगों का स्वास्थ्य जितना अच्छा है उतना आज कल के नौजवानों का नहीं, और अब जो लड़के हैं उनका स्वास्थ्य आगे चल कर और भी खराब होगा। वर्त्तमान समय के दुबले-पतले, क्षीणकाय नवयुवकों के संबंध में उक्ति।
जब नटनी बाँसे चढ़ी तब काहे की लाज।
जब कोई काम करने ही लगे तो फिर उसमें संकोच क्या।
जब विगरे तब सुघर नर, का बिगरेंगे कूर।/ मठा बिचारे का बिगरें, जब विगरे तब दूद।।/ जब बोले तब उबाँड़े।1
(1-टेढ़े।) सीधे तौरपर उत्तर न देने पर।