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अक्षर: ज

अक्षर 'ज' से शुरू होने वाली कहावतें

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जाँतो फूटो, नातो टूटो।

जाँता फूटा और नाता टूटा। विवाहिता लड़‌की की मृत्यु हो जाने पर उसकी ससुराल वालों से प्रायः फिर कोई विशेष संबंध नहीं रहता। रिश्ता एक प्रकार से टूट जाता है। इस अर्थ में कहावत का प्रयोग।

जान न चिनार हतयार भीतरे धरौ।

बिना जान-पहिचान के अपनी चीज दूसरे को सौंप दो।

जान न चिनार, चार मइना साझे में रै जान दो।

जान न पहिचान, चार महीने साझे में रह जाने दो। बिना पूर्व-परिचय के ही निकट का संबंध स्थापित करना।

जान-समज कें कुआ में ढकेल दजओ।

प्रायः लड़की के लिए कहते हैं कि जान-समझ कर अयोग्य वर को सौंप दी।

जानहार पैसा मुठी में सें चलौ जात।

जो हानि होने वाली होती है वह होकर रहती है।

जानहार बऊ, बड़ैरे1 खों खोर।

(1-वह लट्ठा जिस पर छप्पर के छावन की लकड़ियाँ रखी जाती हैं।) बहू तो मरने को थी, दोष देते हैं बड़ेरे को, कि उसके गिरने से मरी।

जानि न जाय निसाचर माया।

दुष्ट मनुष्य का भेद जानना कठिन होता है।

जाने सो बूझे कहा, आद अंत बिरतंत।

समझदार को बहुत बताने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

जाप के बिरतें पाप।

धर्म की ओट में बुरे काम करना।

जामिन न होय चोर कौ, सींग न पकरै ढोर कौ।।

चोर की जमानत नहीं देनी चाहिए, ढोर का सींग भी नहीं पकड़ना चाहिए।

जाये की पोर मताई खों होत।

माता ही प्रसव की वेदना जानती है। अथवा माता को ही संतान के सुख-दुख की चिन्ता होती है।

जार1 खों जेरी2, गँवार खों लठा। कोंदन की रोटी खों भैंस को मठा।।

(1-झरबेरी के कँटीले झाँखड़। 2-झाड़-झंखड़ उठाने की लंबी, दुफँसी लकड़ी।) झाड़-झंखाड़ को उठाने के लिए जेरी, गँवार के लिए लट्ठ और कोदों की रोटी के लिए मठा चाहिए।

जितै जाय भूखा उतै परै सूखा।

दुःखी को सब जगह दुःख ही मिलता है।

जितै नइयाँ सुनवइया, उतै मरौ कहह्वइया।

जहाँ कोई सुनने वाला नहीं वहाँ कहने वाला बेमौत मरता है।

जितै पौनी उतै तगा।

जहाँ पौनी वहाँ धागा। दो का घनिष्ट संबंध।