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अक्षर: ज

अक्षर 'ज' से शुरू होने वाली कहावतें

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जब से जानी तब से मानीं।

किसी बात की जानकारी होने पर उसे मान लेना पड़ता है।

जबर कौ पैंड़ो मूँड़ पै।

जबर्दस्त का बोझ सिर पर। बलवान के आगे सब झुकते हैं।

जबा जर गये भुँजाई धर गये।

हानि की हानि हुई और गाँठ से भी देना पड़ा।

जरयाने उर काँस में खेत करौ जिन कोय। / बैला दोऊ बेंचकें करौ नौकरी सोय।।

झरबेरी और काँस की भूमि में खेती नहीं करनी चाहिए। इससे तो बैल बेच कर नौकरी कर लेना अच्छा।

जरे पै फोरा पारबो।

दुःखी को और अधिक दुःख पहुंचाना।

जलेबी कौ पेंच।

जलेबी बनाने में जिस तरह के पेंच डाले जाते हैं उस तरह की टेढ़ी-मेढ़ी धूर्तता-पूर्ण बात।

जलै और कुलै मिलतन झेल नईं लगत।

जल और एक कुल के आदमियों को परस्पर मिलने में विलंब नहीं लगता।

जा कान सुनी, बा कान निकार दई।

इस कान सुनी, उस कान निकाल दी। किसी बात पर ध्यान न देना।

जाँ की माटी उतईं ठिकाने लगत।

जहाँ मरना बदा होता है अंत समय आदमी वहीं खिच कर पहुँचता है।

जा घर के सब नकटई नकटा।

किसी घर में एक से निर्लज्ज अथवा विलक्षण व्यक्तियों का होना।

जाँ चार बासन होत सो खनकतई है।

जहाँ चार आदमी इक‌ट्ठे रहते है वहाँ आपस में खटपट हो ही जाया करती है।

जाँ जाँ चरन परें संतन के ताँ ताँ बंटाढार।

कोई आदमी जहाँ पहुंचे वहाँ ही काम चौपट हो जाये तब व्‍यंग्‍य में उसके लिए कहते हैं।

जाँ न पोंचे रवि ताँ पोंचे कवि।

जहाँ सूर्य की पहुँच नहीं वहाँ कवि की कल्पना पहुँच जाती है।