अक्षर: ज
अक्षर 'ज' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंजाँ बऊ की पीसनों, उतई ससुर की खाट।
जहाँ बहू को सबेरे उठ कर पीसना है वहीं ससुर लेटा हुआ है। लाज-शर्म या अड़चन की बात।
जा बेरा ना बा बेरा, गधे नौन दै दो।
न तो यह वक्त, न वह वक्त, गधे को नमक दे दो। बेवक्त काम करना।
जाँ मुरगा नई होत ताँ का भोर नई होत।
किसी के बिना किसी का काम नहीं रुका रहता।
जाँ रूख नई उतै अरंडई रूख।
जहाँ कोई विद्वान नहीं होता वहाँ साधारण व्यक्ति को ही लोग बड़ा मानते हैं।
जाँ साठ, ताँ सत्तर।
थोड़े खर्च के लिए काम बिगड़ रहा हो तब प्रयुक्त कि और सही।
जाओ पूत दक्खिन, बेई करम के लच्छन।
अकर्मण्य का कहीं ठिकाना नहीं लगता। अथवा कहीं भी जाओ प्रारब्ध साथ चलता है।
जाकी जाति के जौन है, ताकी पाँत के तौन। / बाघ, बाज के बाचवा, घरे सिखावे कौन। / जाकी देखी जूनरी1 ताकी न्योती चूल2। / जाकी नइयाँ ज
(1-ज्वार। 2-चूल न्योतना = घर भर को भोजन के लिए आमंत्रित करना।) जिसके घर में ज्वार नहीं उसे न्योतना भूल गये। तात्पर्य यह कि पैसे वाले का सब आदर-सत्कार करते हैं।
जाके पाँव न फटी बिंवाई। सो का जानें पीर पराई।।
जिसने स्वयं कभी कष्ट नहीं भोगा वह दूसरों के कष्ट का क्या अनुभव करेगा ?
जाको ऊँचो बैठबो जाको खेत निचान। / ताको बरी का करे जाको मींत दिवान।।
जो बड़ों की संगत में बैठता है, जिसका खेत नीचा है अर्थात जिसमें वर्षा का पानी भरता है, और राजा के मंत्री से जिसकी मित्रता है उसका कोई क्या बिगाड़ सकता है।
जाग जगन्ते पारुआ, लाग लगंते और।
पहरुए जागते ही रहते हैं, चोरी करने वाले अपना काम बना ले जाते हैं।
जागै जो कोऊ धन कौ धनी। जागै जी कों चिन्ता घनी।। / जागे रात अँधेरी चोर। जागै भर बरसाते मोर।। / जागै जीके घर में साँप। जागे जो बि
सावधान रहने से ही लाभ होता है।
जाड़ो ठाँड़ो गैल में करे हेत की बात। / मोरे बैरी तीन हैं, रुई, प्याँर1 उर आग।।
(1-कोदों या धान का भूसा।) शीत के शत्रु कपास, सूखी घास (प्यांर) और अलाव की आग हैं।
जात खाय, कै जाँतो।
जात-बिरादरी के लोग खा पाते हैं या चक्की खाती है। कई जातियों में हर छोटे-छोटे मामले में बिरादरी वालों को खिलाना पड़ता है। उसीसे अभिप्राय है।