अक्षर: प
अक्षर 'प' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंदुख पइसा आऊतन सुख देत, और जातन देत।
पैसा आते दु:ख देता है और जाते दु:ख देता है।
पइसा आई,1 पइसा बाई, पइसा बिन ना होय सगाई।
(1-माँ) पैसे से ही सब कुछ होता है।
पइसा की डुकरो टका मुड़ाई।
जितने की तौ असल वस्तु नहीं, उतने से अधिक उस पर खर्च।
पइसा की भाजी, टका कौ बगार1।
(1-बघार। मिर्च, मसाले आदि का छौंक।) आमदनी कम खर्चा ज्यादा।
पइसा के लानें सरगे थींगरा लगाउत।
पैसे के लिए आकाश में थींगरा लगाते हैं। अर्थात संभव असंभव सभी कार्य आदमी पैसे के लिए करता है।
पइसा के सब साथी।/पइसा के सब सगे।/पइसा के सौ गुलाम।
पैसा होने पर चाहे जितने नौकर रख लो। अथवा पैसे के सब चाकर हैं।
पइसा कौ कोऊ पूरो नइँ, और अक्कल कौ कोऊ अधूरो नइँ।
पैसे की सब अपने पास कमी बताते हैं। उसी प्रकार सब अपने को अक्ल का पूरा बताते हैं। कोई यह स्वीकार नहीं करता कि मेरे पास बुद्धि की कमी है।
पइसा से पइसा आऊत।
पैसे से पैसा आता है। पैसे को पैसा खींचता है। बिना लागत के कोई व्यवसाय नहीं होता।
पइसा हात कौ मैल है।
पैसा हाथ का मैल है। उसके आने का कोई सुख या जाने का रंज नहीं करना चाहिए।
पऊत पऊत की कच्चीं (अथवा खोटीं)।
रोटियाँ तैयार होते-होते ही खाने को मिलेंगी इसका विश्वास नहीं।
पऊत बरा, के पीलऊँ तेल ?
बरा बनाते हो, या पी लूँ तेल ? जो मिलै वही सही। अथवा मेरा काम नहीं करते हो तो जो मन में आयेगा करूँगा।