अक्षर: प
अक्षर 'प' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंपक्षे चोरी, पक्ष न्याय, पक्ष बिना सो मारो जाय।
दुनिया में सब काम दूसरों के बल या तरफदारी से ही होते हैं।
पचै सो खावे, रुचे सो बोले।
जो पचै वहीं खाना चाहिए, जो बात दूसरों को अच्छी लगे वही कहनी चाहिए।
पंछियन के पियें समुद हिलोरें नईं घटतीं।
पक्षियों के पीने से समुद्र का जल कम नहीं होता।
पटक दो, फिर तो हमने जानी।/पटक दो, मूँछें हम उखार लें।/पढ़िये भैय्या सोई, जामें हँड़िया खुदबुद होई।
वही पढ़ो जिसमें रोटी खाने को मिले।
पंडित, बैद, मसालची इनकी उल्टी रीत। / औरन गैल बतायकें आपुन नाकें भींत।।
चतुर विद्वान, वैद्य और मार्गदर्शक दूसरों को जाने का रास्ता बतलाते हैं और स्वयं दीवार लाघँकर आगे बढ़ जाते हैं।
पड़े सुआ बिलइयन खाये।
कोरे अक्षर-ज्ञान से क्या होता है, यदि उसके साथ बुद्धि-विवेक न हो ? तोता इतना पढ़ता है फिर भी उसे बिल्ली खा जाती है।
पड़ौ पट्टू सीताराम कई-हम तौ पढ़े पढ़ाये हैं।
धूर्त को उपदेश देना व्यर्थ है।
पढ़ाओ पढ़े ना खूसर। नवाओ नवे ना मूसर।।
मूर्ख पढ़ाने से नहीं पढ़ता। जैसे मूसल झुकाने से नहीं झुकता।
पथरा का पसीजे ?
पत्थर क्या पसीजेगा ? अत्यंत कठोर चित्त से दया और कंजूस से दान की आशा नहीं की जा सकती।
पथरा तरें हात दबै तौ स्यानपन सें काड़ लेवे।
किसी चक्कर में फँस जाने पर चतुराई से काम लेना चाहिए।
पथरा तरें हात दबो।
ऐसे संकट में पड़ जाना, जिससे छूटने का उपाय न दिखायी देता हो। बुरी तरह फँस जाना। प्रायः किसी के पास रकम दब जाने पर कहते हैं।
पथरा सें ईंट कोंरी होत।
पत्थर से ईंट मुलायम होती है। दो हानिकर वस्तुओं में से जिससे कम हानि होने वाली हो, उसको ही स्वीकार कर लेना चाहिए।