अक्षर: प
अक्षर 'प' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंपनइयन साँप मारबो।
किसी संकट या दुष्ट से छुटकारा पाने के लिए अपर्याप्त साधन से काम लेना।
पर घर कूँदें मूसरचंद।
बिना बुलाये किसी के यहाँ जाना या किसी के काम में हस्तक्षेप करना मूर्खता है।
पर हत बनज, सँदेसन खेती, कड़वारे के दाम।/सजन सावगत जिन करौ, घर हटकत है बाम।।
पराये हाथ से व्यापार, सँदेशों से खेती, और ऋण लेकर साहूकारी नहीं करनी चाहिए।
परदेसी की प्रीत, रैन कौ सपनो।/ पर बन बाँधे मूरखनाथ।
मूर्ख आदमी ही दूसरों की रकम अपने साथ लेकर चलता है।
परसन भईं भवानीं, कौरन लागीं खान।
भवानी प्रसन्न हुईं तौ जूठे टुकड़ों से ही पेट भरने लगीं। मौज में आकर ओछे से ओछा काम भी कर डालना।
पराई पतरी कौ बड़ो बरा।
दूसरे के हिस्से में आयी हुई वस्तु सदैव अच्छी लगती है।
पराई सरायँ कों धुआँ देतन कोऊ नईं देखत ?
दूसरे के घर में लगी आग कोई नहीं देखता।
पराये कँदा पै होकें बंदूक घालबो।
दूसरों की ओट लेकर काम करना। टट्टी की ओट से शिकार।
पराये खसम के लानें सत्ती होवो।
किसी दसरे के लिए व्यर्थ कष्ट उठाना। झूठी सहानुभूति दिखाना।
पराये घर की थाती।
दूसरे की धरोहर। ऐसी वस्तु जिसे बहुत दिनों तक घर में रखा न जा सके। विवाह योग्य हुई सियानी लड़की के लिए प्रयुक्त।