अक्षर: प
अक्षर 'प' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंपराये पूतन सपूती होबो।
पराये पुत्र के सहारे अपने को पुत्रवती मान लेना। दूसरे की वस्तु को अपनी समझ लेना, और यह आशा करना कि समय पर वह काम भी देगी।
पराये माथें सिल फोरबो।
दूसरों को संकट में डाल कर अपना काम बनाना। आयी हुई विपत्ति दूसरों के सिर मढ़ना।
परी गरज मन और है, सरी गरज मन और।
गरज पड़ने पर आदमी का मन जैसा रहता है वैसा गरज पूरी होने पर नहीं रहता।
परेवा की सोर।
कबूतर की सोहर। कहते हैं कबूतर की मादा साल में बराबर अंडे देती रहती है। उसी प्रकार किसी घर में जब निरंतर बच्चे पैदा होते रहते हों, और कोई-न-कोई स्त्री सोहर में पड़ी रहती हो तब प्रयुक्त।
पल में परलय होत।
पल में प्रलय होती है। क्षण भर में न जाने क्या से क्या हो सकता है।
पसेरी उठे ना, ब्याई कों मूँड़ मारें।
पसेरी तो उठती नहीं, फिर भी तौलाई का ठेका लेना चाहते हैं। काम करने की सामर्थ्य न होने पर भी उसके लिए हठ करना।
पसेरी भर कौ मूँड़ तौ हलाउत, पइसा भर की जीब नई हला पाउत।
जब कोई आदमी, विशेषकर कोई छोटा लड़का, किसी बात के उत्तर में केवल अपना सिर हिला देता है और स्पष्ट रूप से हाँ या ना कुछ नहीं कहता तब कहते हैं।
पहिरिये खदा1, निभैये सदा।
(1-मोटा कपड़ा, खादी।) मितव्ययिता से रहने पर आदमी को जीवन में कभी कष्ट नहीं उठाना पड़ता।
पाई-पुरिया सी पूरत फिरत।
किसी एक स्थान पर बार-बार इधर से उधर निकलने और काम में अड़चन डालने वाले ऊघमी लड़के के लिए प्रयुक्त। (ताना बनाने के लिए एक निश्चित लंबाई के भीतर थोड़ी-थोड़ी दूर पर गड़ी हुई चौमुखी लकड़ियों में सूत भरने को पाई-पुरिया पूरना कहते हैं। यह कार्य प्रायः स्त्रियाँ ही करती है। पुरिया पूरते समय वे बड़ी तेजी से एक छोर से दूसरे छोर पर जातीं और वापिस लौटती है।)
पाँच पचासै लै गई, पाँचै लै गई एक। / एक टकौना एकै लै गईं, परी परी दिन लेख।।
ब्याज की लालच में आदमी मूल से भी हाथ धो बैठता है।
पाँच पंडबा और छँट (अ) ये नरायन। (अथवा छँट (अ) ईं द्रोपदी)।
जब कुछ आदमियों में एक और आदमी ऐसा आकर मिल जाये जो उनसे विशेष चतुर हो तब व्यंग्य में।
पाँचऊ घी में।
पाँचों उंगली घी में। जिसके खूब छक्के-पंजे उड़ रहे हों उसके लिए।