अक्षर: म
अक्षर 'म' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंमउअन के टपकें धरती नईं फटत।
महुआ के फूलों के टपकने से धरती नहीं फटती। किसी अत्यन्त तुच्छ आदमी से बड़े काम की आशा व्यर्थ है।
मउआ मेवा बेर कलेवा गुलगुच1 बड़ी मिठाई। / इतनी चीजें चाहो तो गुड़ाने1 करो सगाई।।
(1-महुए का पका हुआ फल। 2-मध्यप्रदेश के उस भाग को गोंडवाना कहते हैं जहाँ किसी समय गोंडों का राज्य था। यहाँ के जंगलों में महुआ और बेर बहुत होता है।) महुए का मेवा, बेर का कलेवा और गुलगुच की मिठाई खाना चाहते हो तो गोंडवाने में विवाह करो।
मउआ मोरें भुँजे धरे हैं, लटा1 धरे हैं कूट। ग्योड़ होकें साजन कड़ गये, कौन बात की चूक।।
(1-भुने हुए महुओं को कूट कर और उनमें गरी, चिरोंजी आदि मेवा मिलाकर बनाया गया खाद्य पदार्थ।) महुआ मेरे यहाँ भुने रखे हैं, लटा भी कुटे रखे हैं, फिर मुझसे ऐसी कौन सी भूल हो गयी कि साजन गाँव के पास से निकल गये और हमारे घर नहीं आये।
मकर चकर की घानी। आदो तेल आदो पानी।।
धूर्त और कपटी व्यवसायी के लिए प्रयुक्त।
मगरै बुड़कैयाँ सिखाउत।
मगर को डुबकी मारना सिखाते हैं। चालाक को चालाकी क्या सिखाना ?
मंगलवारी परै दिवारी। मूँड़ धर रोवे बेपारी।।
लोक-विश्वास है कि मंगलवार को दिवाली पड़े तो यह व्यापारियों के लिए शुभ नहीं होती।
मघा-पूर्वा लागीं जोर। उर्द मूँग सब धरो बहोर। बऊत बने तो बैयो। नातर बरा बरी कर खैयो।।
मघा और पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में खूब पानी बरसने से उर्द और मूंग की फसल को हानि पहुँचती है। इसलिए ऐसे समय में इनको बोते बने तो बो देना चाहिए। अन्यथा अच्छा यह है कि बरा-बरी बनाकर खा लिया जाय।
मघा1 न बरसे भरे न खेत। माता न परसे भरे न पेट।।
(1-भादों के महीने का एक नक्षत्र।) मघा में पानी बरसे बिना खेत नहीं भरते, और माता के परसे बिना पेट नहीं भरता।
मछरी के जाये, किन तैराये।
मछली के बच्चों को तैरना कौन सिखाता है? अपने आप आ जाता है। पैतृक गुण किसी को जिसका जो स्वभाव है वह सिखाना नहीं पड़ता।
मठा बिचारे का बिगरें जब बिगरें तब दूद।
किसी बात की हानि तो बड़े आदमियों की ही होती है गरीबों की क्या होगी ?
मँड़पुआ की नाक पोंछने परत।
माँड़े बनाने वाले की नाक पोंछनी पड़ती है। जिस आदमी से कोई काम लेना होता है उसकी सब तरह से खुशामद करनी पड़ती है।
मँड़वा बाँदवे सब आऊत, छोरबे कोऊ नईं आऊत।
मंडप बाँधने सब आते हैं, छोरने कोई नहीं आता। बने काम में सब साथ देते हैं।
मत बारे की माँ मरे, मत बूढ़े की जोय।
छोटी उम्र में किसी की माँ न मरे, और बुढ़ापे में किसी की स्त्री।
मताई बाप ने जनम दओ, करम नई दओ।
माँ-बाप जन्म देते हैं, परन्तु सब अपना-अपना भाग्य साथ लेकर आते हैं।
मताई, मोय पीरें आवें तब जगा दियो, कई- बेटा तुमतो उपतइँ के सबरे गाँव कों जगाउती फिरो।
किसी लड़की के बच्चा होने वाला था। अपनी माँ से उसने कहा-माँ, मुझे जब प्रसव की पीड़ा हो तो जगा देना। माँ ने उत्तर दिया- बेटा, तुम तो स्वयं ही पूरे गाँव को जगाती फिरोगी। जिसे कष्ट होता है वह स्वयं चिल्लाता है।
मन के हारें हार है, मन के जीते जीत। / मन कौ चीतौ होय नहिं, प्रभु चीतो तत्काल।
मनुष्य का सोचा कुछ नहीं होता, भगवान जो चाहता है वही होता है।