अक्षर: म
अक्षर 'म' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंमाँग चूंग कें-करी तीजा1। भोरईं हो गओ बीदक-बीदा।।
(1- भादों सुदी तीज का पर्व, हरतालिका व्रत।) माँग-चूँग कर तो तीज का त्यौहार मनाया और सबेरे ही मुसीबत आ गयी! जिससे पैसा उधार लिया था वह माँगने आ गया।
माँगे की बछिया, पर पर दाँत निहारें।
मुफ्त की चीज का क्या देखना ? उसे तो चुपचाप ले लेना चाहिए।
माँगे के बैल अँधिरिया रात।
माँगे के बैल, और अँधेरी रात। तात्पर्य यह कि कोई देखेगा नहीं, मजे में रात भर जोतो। दूसरे की वस्तु का लोग सदैव दुरुपयोग करते हैं।
माँगे कौ मठा मोल बिरोबर।
माँगी हुई वस्तु सदैव मँहगी पड़ती है, अव्वल तो देने वाले के सौ नखरे सहने पड़ते हैं और फिर ऊपर से एहसान अलग।
माँगें मिलें न चार, पूरे पूरे पुत्र बिन। / इक बिद्या, इक नार, घर संपत, सरीर सुख।।
विद्या, स्त्री, घर सम्पत्ति और निरोगी काया माँगने से नहीं मिलते।
माघ तिला तिल बाढ़े। फागुन गोड़े काढ़े।।
माघ में दिन थोड़ा-थोड़ा करके बढ़ने लगता है। फागुन के महीने में प्रत्यक्ष बढ़ जाता है।
माघ मास की बादरी, और क्वाँर कौ घाम। / जे दोऊ जो कोऊ सहै करै किसानी काम।।
किसान का काम कठिन है उसे खेती करते समय माघ के बादलों और आश्विन की धूप का तेज सहन करना पड़ता है।
माँछी बिडारबे बैठे, संगे जेउन लगे।
मक्खियाँ भगाने बैठे, और साथ खाने लगे। काम कुछ सौंपा गया, करने कुछ लगे।
माटी कत, मोय छू तौ देखो।
मिट्टी कहती है, मुझे छूकर तो देखो। मकान की मरम्मत आदि का काम प्रारंभ में तो थोड़ा जान पड़ता है, परंतु शुरू करते ही बहुत बढ़ जाता है।
माटी की देवी तिलकनई कों भई।
मिट्टी की देवी तिलक लगाने में ही खतम हो गयीं ! माँगे-चूंगे में ही किसी वस्तु का धीरे-धीरे करके खतम हो जाना।
माँठ1 कौ माँठ बिगरौ।
(1- मटकी, नील के रंग का खमीर।) माँठ का माँठ बिगड़ा है। पूरा मामला ही गड़बड़ है।
माते दुके पयाँर में, को कये बैरी होय।
बड़े आदमियों की बात कह कर कौन उनसे बुराई मोल ले ?