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अक्षर: म

अक्षर 'म' से शुरू होने वाली कहावतें

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मरियाँ मुंस, घर में खुंस।

दुबले-पतले मरतुले, पति से स्त्री सदैव रुष्ट रहती है।

मरी किल्लन काजर देत।

मरी किल्लियों को काजल लगाते हैं। निकृष्ट या नष्ट प्रायः वस्तु को सुन्दर बनाने की चेष्टा करते हैं।

मरी किल्ली की नाई लेखबो।

किसी को बिलकुल तुच्छ समझना। परवाह न करना।

मरी जायें मलारै गावैं।

मरने को हो रही है, परन्तु मल्हार गाती हैं। घर में खाने को नहीं, गाना सूझता है।

मरी बछिया वामन के नाव।

निकम्मी वस्तु दूसरे के मत्थे मढ़ना।

मरी मिदरियन छाले पर गये।

मरी मेढ़की को छाले पड़ गये। कोई छोटा आदमी जब नजाकत दिखाये। मेढकी को भी जुकाम !

मरे ढोर कों किल्‍लीं छोड़ देती।

जिससे कुछ मिलने की आशा नहीं होती लोग उसे त्याग देते हैं।

मरे पूत की बड़ी आँखें।

हाथ से जो वस्तु निकल जाती है उसकी सब प्रशंसा करते हैं। मरे आदमी को सब अच्छा कहते है।

मरे पूतन हूँका भराउत।

मरे लड़के से हाँ कराना चाहते हैं। ऐसा हठ जो पूरा न हो सके।

मरे लों कौ बैराट1।

(1-बैरभाव, शत्रुता) मरने तक के ही सब झगड़े हैं।

मरे लौं कौ नातो।

मरने तक ही दुनिया से नाता रहता है।

मरे सांप की आँखें कुरेदबो।

मरे को मार कर अपनी बहादुरी दिखाना।

मरै न करै, हुकुर हुकुर करे।

ऐसे बूढ़े रोगी से कहते हैं जिसकी सेवा करते-करते लोग ऊब जाते हैं।

मरै न माँचों देय।

न तो मरता है और न चारपाई छोड़ता है। बूढ़े के लिए।

मरै बाप रोवें अजा कौं।

कष्ट तो किसी बात का, रोवें किसी और बात के लिए।

मर्द मुछारौ, बर्द पुछारौ।

मर्द मूँछो वाला और बैल बड़ी पूँछ वाला अच्छा होता है।