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अक्षर: म

अक्षर 'म' से शुरू होने वाली कहावतें

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मन चलत, पै टटुआ तौ चलतई नइयाँ।

वृद्धावस्था में शरीर साथ नहीं देता तब कहते हैं।

मन चले कौ सौदा।

जिसे जो वस्तु अच्छी लगती है वही खरीदता है।

मन मन भावे, मूँड़ हलावे।

किसी वस्तु को लेने की आन्तरिक इच्छा होते हुए भी ऊपर से इन्कार करना।

मन महीप के आचरण, दृग दिमान कह देत।

मन की बात चेहरे पर प्रकट हो जाती है।

मन में उठी हुलक, तौ का खँजरी का ढुलक।

किसी काम को करने की उमंग मन में उठे तो उसे कर ही डालना चाहिए।

मनायँ मनायँ खीर न खाई, जूँठी पातर चाटन आई।

अंत में हार कर वही काम करना जिसके लिए पहिले इन्कार कर दिया।

मर गई किल्ली काजर कों।

किल्ली काजल लगाने की अभिलाषा में मर गयी! जब कोई काली-कलूटी स्त्री अपने को बहुत सुन्दर बनाने की चेष्टा करे तब उसके लिए कहते हैं।

मर गई तौ पठई दै।

मर गयी है तो भी भेज दो। किसी वस्तु के लिए अनुचित रूप से हठ करना।

मरका बैल और टिमकुल जनी। इनके मारें रोवे धनी।।

जिस किसान का बैल मरकहा और स्त्री बनाव-शृंगार करने वाली होती है वह सदैव कष्ट भोगता है।

मरका बैल भलो, कै सूनी सार1।

(1-ढोर बाँधने का स्थान, पशुशाला)। सार सूनी रहे इससे तो मरकहा बैल अच्छा।

मरघटा कौ गओ को लौटत ?

मरघट का गया कौन लौटता है? गयी बात फिर हाथ नहीं आती।

मरदे रोटी, बरदै काँस।

मर्द को अच्छा खाना, और बैल को अच्छा घास चाहिए।

मरबे कों का हाती-घोड़ा जुतत ?

मरने का क्या ठीक ? समय आया मर गये।

मरबो भलो बिदेस कौ जहाँ न अपनो कोय। / माटी खायँ जनावरा, महामहोच्छव होय।।

जिस स्‍थान में अपना कोई न हो ऐसे परदेश में मरना श्रेष्‍ठ है कम से कम मृत देह के मांसाहारी पशु पक्षी खाएँगे तो उनकी दावत हो जाएगी।

मरियाँ मुंस करम ढकना, कोदों की रोटी पिट भरना।

कोदों की रोटी केवल पेट भरने के लिए होती है, उसी प्रकार मरतुला पति भी केवल सौभाग्य की रक्षा के लिए होता है।