अक्षर: म
अक्षर 'म' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंमन चलत, पै टटुआ तौ चलतई नइयाँ।
वृद्धावस्था में शरीर साथ नहीं देता तब कहते हैं।
मन मन भावे, मूँड़ हलावे।
किसी वस्तु को लेने की आन्तरिक इच्छा होते हुए भी ऊपर से इन्कार करना।
मन में उठी हुलक, तौ का खँजरी का ढुलक।
किसी काम को करने की उमंग मन में उठे तो उसे कर ही डालना चाहिए।
मनायँ मनायँ खीर न खाई, जूँठी पातर चाटन आई।
अंत में हार कर वही काम करना जिसके लिए पहिले इन्कार कर दिया।
मनुस बली नहिं होत है, समय होत बलवान। भीलन लूटी गोपिका बेइ अर्जुन बेइ बान।।
भाग्य के सामने मनुष्य की नहीं चलती।
मर गई किल्ली काजर कों।
किल्ली काजल लगाने की अभिलाषा में मर गयी! जब कोई काली-कलूटी स्त्री अपने को बहुत सुन्दर बनाने की चेष्टा करे तब उसके लिए कहते हैं।
मर गई तौ पठई दै।
मर गयी है तो भी भेज दो। किसी वस्तु के लिए अनुचित रूप से हठ करना।
मरका बैल और टिमकुल जनी। इनके मारें रोवे धनी।।
जिस किसान का बैल मरकहा और स्त्री बनाव-शृंगार करने वाली होती है वह सदैव कष्ट भोगता है।
मरका बैल भलो, कै सूनी सार1।
(1-ढोर बाँधने का स्थान, पशुशाला)। सार सूनी रहे इससे तो मरकहा बैल अच्छा।
मरबो भलो बिदेस कौ जहाँ न अपनो कोय। / माटी खायँ जनावरा, महामहोच्छव होय।।
जिस स्थान में अपना कोई न हो ऐसे परदेश में मरना श्रेष्ठ है कम से कम मृत देह के मांसाहारी पशु पक्षी खाएँगे तो उनकी दावत हो जाएगी।
मरियाँ मुंस करम ढकना, कोदों की रोटी पिट भरना।
कोदों की रोटी केवल पेट भरने के लिए होती है, उसी प्रकार मरतुला पति भी केवल सौभाग्य की रक्षा के लिए होता है।