अक्षर: ह
अक्षर 'ह' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंहँड़िया कौ एक सीत टटोउनें आऊत। (सबरी हँडिया में हात नईं डारनें आऊत)
हाँड़ी का एक चावल देखने से ही पता चल जाता है कि सब चावल गल गये या नहीं। पूरी हाँड़ी में हाथ डालने की आवश्यकता नहीं पड़ती। एक बात से मन का सारा हाल जान लिया जाता है।
हँड़िया है सरमदार, छः मइना में चुरै दार। / पावनो है गम्मखोर, बरस भर न छोड़े दोर।।
किसी के यहाँ कोई फालतू मेहमान आ गया। घर की मालकिन ने उसे टरकाने के उद्देश्य से कहा- भोजन आपको बहुत विलंब से मिलेगा। मेरी हाँड़ी बहुत शर्मीली है। उसमें छ: महीने में दाल पकती है। इस पर मेहमान ने उत्तर दिया कोई चिन्ता की बात नहीं। मैं भी बड़ा गमखोर हूँ। एक वर्ष तक तुम्हारा घर नहीं छोडूंगा। मेहमानदारी करने वालों पर व्यंग्य।
हंते कों हनिये, पाप-दोख ना गिनिये।
जो दूसरों को मारे उसे मारने में कोई पाप नहीं।
हम का गदा चराउत रये ?
हम क्या गधे चराते रहे? अर्थात हम क्या निरे मूर्ख है ?
हम फूटे तुम जाँजरे, हरईं कें भेंट लो।
हम फूटे हैं और तुम जर्जर, धीरे से भेंट लो।
हमने कौन तुमाये हात के करिया तिल खाये।
अर्थात हम तुम्हारे किसी बात के ऋणी नहीं।
हमें कौन तुमसें मूसर बदलवाँवने।
हमें तुमसे क्या मतलब ? तुम्हारे बिना हमारा कोई काम अटका नहीं रहेगा।
हर ददा के, बैल ददा के, टिकटिक करतन का लगत।
दूसरों का पैसा खर्च करने में गाँठ का क्या जाता है ?
हर हाँके भूकन मरें, बाबा लाडू खायँ।
जी तोड़ परिश्रम करने वाले तो भूखों मरते हैं और निठल्ले मौज उड़ाते हैं।
हरताल1 फेरबो।
(1-हड़ताल, एक विषैला खनिज पदार्थ, प्राचीन काल में हस्तलिखित पोथियों के अक्षर मिटाने में उसका उपयोग होता था।) बने-बनाये काम को चौपट कर देना।
हर्र बहेरो आँवरो, घी सक्कर सें खाय। / हाथी दाबै काँख में सात कोस लों जाय।।
घी-शक्कर के साथ त्रिफला का सेवन करने से बल की वृद्धि होती है।
हर्रा लगै न फिटकरी, रंग चोखो आवे।
खर्च कुछ न हो और काम अच्छा बने! यह कैसे संभव है ? (पक्का खाकी रंग बनाने के लिए हर्र, बहेड़े के साथ फिटकरी की आवश्यकता पड़ती है।)