अक्षर: अ
अक्षर 'अ' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंआँदरी घुरिया, फेंकूड़े चना। चले आउन दो घना के घना।
घोड़ी अंधी है, और चने भी फफूंड़े हैं, फिर क्या है उसे चाहे जितना खिलाते चले जाओ। (1) जैसे को तैसा मिलना। (2) मूर्ख को गुण की पहिचान नहीं होती।
आदे गाँव दिवारी1, आदे गाँव धमार2।
(1.दीपावली उत्सव पर गाये जाने वाले ग्रामीण गीत। 2.होली के गीत। एक राग।) आधे गाँव में दिवाली मनायी जा रही है और आधे में होली। सह्योग से काम न होना।
आँधी के आम।
(1) सस्ती चीज जो यकायक मिल रही हो। (2) बहुत दिनों न टिकने वाली वस्तु।
आँधी कौ मेव, बैरी कौ सनेव।
आँधी का मेह उसी प्रकार क्षणस्थायी होता है जैसे बैरी का स्नेह।
आप खायँ हरवकत, बाँट खायँ बरक्कत।
अकेले खाना ठीक नहीं, बाँट कर खाने से धन-दौलत की बढ़ती होती है।
आप जायँ अदियाँ, परोसी जायँ सबियाँ।
अपने किसी कार्य की स्वयं उपेक्षा की जाय तो पड़ोसी तो उसमें बिलकुल ही रुचि नहीं दिखायेंगे।
आप तौ आप और बगल चाप।
(1) खा भी लिया और बगल में दबा भी लिया। (2) आप भी गये, दूसरों को भी ले गये।
आप मियाँ मंगते, दुआर खड़े दरवेस1।
(1.दरवेश, फकीर।) जो स्वयं दूसरों का मुखापेक्षी है वह किसी की क्या सहायता करेगा ?
आपुन ठाँड़े गैल में, करें और की बात।
स्वयं तो दुनिया से जाने की तैयारी में हैं दूसरों की चिन्ता करते हैं।
आबर्दा तौ भौत, पै रँड़ापो तौ रोको।
आयु तो लंबी है, पर रँड़ापा तो रोको। जीवन सुख से न बीते तो दीर्घायु किस काम की? किसी के द्वारा लाभ के साथ जब हानि भी हो रही हो तब प्रयुक्त।