अक्षर: अ
अक्षर 'अ' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंअल्ला देवे खाने को, तौ कुतका जाय कमाने को।
मुफ्त का खाने को मिले तो कमाने कौन जाय ?
अष्ट कपाली1 दालुद्री, जब चालै तब सिद्ध।
(1.अभागा।) शकुन और मुहूर्त तो धनवान के लिए हैं, जो जन्म से ही दरिद्री और अभागा है उसे यात्रा का मुहूर्त आदि क्या देखना। वह तो जब चल दे तभी शुभ।
असाड़ कौ पजो लड़इया, भादों कहै भौत बरसा भई।
असाढ़ में तो गीदड़ का जन्म हुआ, भादों में कहता है बहुत वर्षा हुई !
असी कोस ससरार गेंवड़े1 से काँछ खोलें।
(1.गेंवड़ा-गाँव के बाहर का हिस्सा जहाँ लोग शौचादि के लिए जाते हैं।) ससुराल के लिए अस्सी कोस तो चलना है पर गेंवड़े से ही काँछ खोल दी। अर्थात् कार्य आरंभ होने के पूर्व ही हिम्मत हार दी।
अँसुआ न मसुला, भैंस कैसे नकुआ
व्यर्थ रूठने और नाक फुलाने वाले बच्चों के लिए कहते हैं।
आ बरा1 मोरे मों में पर।
(1.उड़द की पीसी हुई दाल का बना हुआ एक प्रकार का पक्वान। बटवृक्ष का फल।) आ बरा मेरे मुँह में आकर गिर। निपट आलसी के लिए प्रयुक्त।
आई बाई1 वै गई झाँई।
(1. माँ। बहिन। सखी-सहेली।) बाई आयीं और झलक दिखा कर चली गयीं। काम से जी चुराने वाली स्त्री के लिए कहते हैं।
आई सतुअन की बहार, बालम मूंछें मुड़ा डारो।
क्योंकि सत्तू मूंछों में लगता है। एक लोकगीत की कड़ी।
आऊत लच्छमी खों टटा देत।
आती लक्ष्मी के लिए दरवाजा बंद करते हैं। अनायास प्राप्त पैसे को ठुकराते हैं।
आँएँ तौ गाँव की सुवासिन1, पै चिंदरती2 हैं।
(1.विवाह के पश्चात् भी पिता के घर आकर रहने वाली लड़की। 2.चिदरना जान-बूझ कर अनजान बनना।) गाँव की लड़की होकर भी इस प्रकार बात करती है मानों कुछ जानती ही नहीं। किसी विषय को जानते हुए भी अनजान बनने पर कहते हैं।
आँक, टाँक अर काजरे। देव टका भर आगरे।
अक्षर, सिलाई के टाँक और काजल, ये टका भर अगरे, अर्थात् थोड़े गहरे होना चाहिए, तभी ये ठीक रहते हैं।
आँख फूटी पीर निजानी।
विपत्ति का कारण दूर होने पर विपत्ति से भी छुट्टी मिल जाती है।