अक्षर: क
अक्षर 'क' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंकहता सो कहता, सुनता सरेख चाहिए।
बात कहने वाला तो ठीक है, परन्तु सुनने वाला भी सुघड़ चाहिए।
कहूँ कहूँ गोपाल की गई सिटल्ली भूल। काबुल में मेवा कियो, ब्रज में कियो करील।
जिस वस्तु की जहाँ आवश्यकता हो, वहाँ वह न हो, और अन्यत्र प्राप्त हो तव प्रयुक्त।
कहै दुरकन1 सुन पिय काँस2। तुम लागौ दतुआ3, हम लागे पाँस4। बड़े बड़े बैल खुटारी5 पांस। का करै दुरकन का करै काँस।
(1.एक प्रकार की मजबूत बेल जिसकी जड़ें बड़ी गहरी जाती है, और जो खेत में फैलकर फसल को हानि पहुँचाती है। 2.एक प्रकार की घास। 3. बखर में लगे हुए लकड़ी के खूंटे, जिनमें पौस फंसी रहती है। 4. बखर में लगी हुई लोहे की चौड़ी धार दार पत्ती जो लगभग 30 अंगुल लंबी और 5. अंगुल चौड़ी होती है। 6. ऊँची धार वाली।) दुरकन् कहती है कि हे प्रियतम काँस सुनो, तुम तो बखर के दंतुआ से चिपटो और मैं पाँस में फैलूंगी, जिससे खेत में जोताई बखराई न हो पाये। इस पर किसान कहता है- मेरे बड़े-बड़े बलवान बैल हैं और पाँस भी मजबूत धार वाली है, मेरा क्या तो दुरकनू बिगाड़ सकती है, और क्या कौस ?
काँ कौ पँवारो लगाओ।
कहाँ का पँवारा लगाया ? अर्थात कहाँ का लंबा-चौड़ा किस्सा छेड़ दिया !
का खाँड़ के घुल्ला1 हौ जो कोऊ घोर के पी ले (ए)।
(1.घोड़ला, घोड़ा। मकर संक्रान्ति के अवसर पर बनने वाले शक्कर के घोड़े और खिलौने।) क्या शक्कर के खिलौने हो जो कोई घोल कर पी लेगा ?
का मरतनई साई1 पर जै (ए)।
(1.ढोरों के सड़े हुए घाव में पड़ने वाला एक कीड़ा।) क्या मरते ही साई पड़ जायगी ? अर्थात क्या कार्य इतने शीघ्र बिगड़ जायगा कि सँभाला न जा सके।
काँ राम राम काँ टें टें।
जहाँ दो बातों की कोई तुलना न की जा सके, एक अधिक अच्छी और दूसरी नितान्त बुरी हो।
काऊ की बऊ, कोऊ बरा1 बदलावे।
(1.टेहुनी से ऊपर हाथ में पहिनने का चाँदी या सोने का आभूषण।) किसी की बहू और कोई शराफ की दूकान पर उसका बरा बदलवाने जाय। जब कोई अनुचित रूप से किसी के काम में हस्तक्षेप करे, अथवा बुरी नीयत से किसी की सहायता को उद्यत हो।
काऊ खों भटा बायले काऊ खों पित्त करें।
बैंगन किसी के लिए तो वायुवर्द्धक होते हैं और किसी की भूख बढ़ाते हैं। एक ही वस्तु किसी के लिए हानिकर और किसी के लिए गुणकारी होती है।
कागज की भसम किन भसमन में। करी खसम किन कसमन में।।
कागज की भस्म की जिस प्रकार कोई गिनती नहीं, उसी प्रकार किया हुवा दूसरा पत्ति भी किस गिनती में ? अर्थात वह किसी काम का नहीं।
कागद थोरो हित घनो।
कागज में स्थान इतना कम है कि लिख कर प्रेम प्रकट नहीं किया जा सकता।
कागद होय तौ बाँचिये, करम न बाँचे जायें।
कागज में लिखे हुए को तो पढ़ा जा सकता है, परन्तु कर्म में लिखे को कोई नहीं पढ़ सकता। एक लोकगीत की कड़ी।
काजर की कोठरी में कैसोहू सयानो जाय, एक रेख काजर की लागि है पै लागि है।
बुरे के साथ बुराई हाथ आती ही है।