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अक्षर: ग

अक्षर 'ग' से शुरू होने वाली कहावतें

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गदा न सई रंगटा सई।

गधा न सही रंगटा सही। व्यर्थ तर्क-वितर्क के समय प्रयुक्त।

गयें हान न मरें पछतान।

ऐसी वस्तु के लिए प्रयुक्त जिसके खो जाने या चले जाने से कुछ बनता-बिगड़ता न हो। ऐसे व्यक्ति के लिए भी जिसके मरने पर कोई रोने वाला न हो।

गर (अ) ओ पथरा चूम के छोड़ दओ जात।

भारी पत्थर चूम कर छोड़ दिया जाता है। जो काम अपने सामर्थ्य से बाहर हो उसे चुपचाप छोड़ देना।

गरज परे पराई मताई सें मताई कने परत।

गरज पड़ने पर दूसरे की मां से मां कहना पड़ता है।

गरजें सो बरसें का।

गरजने वाले बादल बरसते नहीं। बकवादी आदमी से काम नहीं होता।

गरब तौ रावन कौ नई रओ।

गर्व तो रावण का भी नहीं रहा।

गरया बैल करारा खों।

निकम्मा बैल करार से पटकने के लिए! किसी तरह पिंड तो छूटे !

गरव कियो रतनाकर सागर नीर कर डारो खारो। गरब कियो चकवा चकवी रैन बिछोहा पारो।।

एक लोकगीत की पंक्तियां जो ठीक इसी रूप में गुजरात में भी प्रचलित हैं।

गरीब की हाय, सरबस खाय।

गरीब की हाय सर्वस्व नाश कर देती है।

गरीब कौ खाय बाको सत्यानाश जाय।

गरीब का खाने से सर्वनाश होता है।

गरैं परो (ढोल) बजाय सिद्ध।

जो काम सिर पर आ गया उसे तो किसी प्रकार पूरा करना ही पड़ता है।

गर्रानो सो अर्रानो।

बहुत घमंड करने वाला नष्ट होता है।

गँवार कों पापर।

अयोग्य को कोई अच्छी वस्तु देना।

गा (ह) क और मौत कौ का ठीक, कबै आ जाय !

मौत की तरह गाहक का भी ठीक नहीं कि कब आ जाय, इसलिए दूकानदार को दूकान नहीं छोड़नी चाहिए।