अक्षर: ग
अक्षर 'ग' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंगुरू कीजे जान कें, पानी पीजें छान कें।
गुरू देखभाल कर और पानी छान कर पीना चाहिए।
गूजर तके ऊजर।
गूजर ऊजड़ स्थान में रहना पसंद करता है, इसलिए कि उसके ढोर बिना रोक-टोक चर सकें।
गेंवड़े आई बरात, बौंडार कातबे बैठे।
(1-कन्या के विवाह के अवसर पर दहेज में दिये जाने वाले कपड़े।) ऐन मौके पर कोई काम करने बैठना।
गेंवड़े खेती हम करी कर धोबिन सों हेत। अपनो करौ कौन से कइये चरौ गदन ने खेत।।
किसी किसान का एक धोबिन से प्रेम हो गया। उसके कहने से उसने गाँव के बाहर गेंवड़े में ही खेती की। परिणाम यह हुआ कि सब फसल उस घोबिन के गधे ही चर गये।
गेंवड़े खेती, गाँव सगाई, जिनकर, जिनकर जिनकर भाई।
यह कहावत बुन्देलखंड में इतनी ही सुनने को मिलती है। परन्तु पूरी इस प्रकार है:- गेंवड़े खेती गाँव सगाई, तिलगुर भोजन तुरुक मिताई, पैलें सुख पाछे दुखदाई, जिनकर जिनकर जिनकर भाई।
गेंवड़े पीपर, मेंड़े महुआ, बन में तिली, राँड़ में रडुआ1।
(1-ऐसा नौकर जो केवल रोटियों पर रखा गया हो)। गाँव के बाहर, जहाँ लोग शौचादि के लिए जाते हैं पीपल, खेत की मेड़ पर महुआ, कपास में तिली, और राँड़ के घर में रडुए का होना ठीक नहीं।
गै गै पृथिवी भारी है।
पग पग पर पृथिवी भारी है। अर्थात् एक से एक बढ़ कर वस्तुएँ संसार में भरी पड़ी हैं। रत्नगर्भा वसुंधरा।
गैल कौनऊँ जाये, बैल घरई के आयें।
किसी आदमी के बैल भटक गये। उसके साथी ने कहा- देखो, तुम्हारे बैल कहाँ जा रहे हैं? इस पर उसने उत्तर दिया- चिन्ता की बात नहीं, बैल घर के ही हैं। किसी रास्ते जायें। भूलेंगे नहीं। ढोरों की स्मरण शक्ति के संबंध में कहावत।
गैल में ठाँड़े।
अर्थात् संसार का सब झगड़ा छोड़ चुके हैं। जाने को तैयार खड़े हैं। हमें किसी बात से क्या मतलब ?
गैल में पाई फकीरनी1, गुर बाँटो न सिन्नी।
(1-वह रंगीन डोरा जो मुहर्रम के दिनों में ताजिए पर गुड़, शर्बत या मिठाई चढ़ाने के बाद प्रसाद के रूप में गले में पहिनने को मिलता है। यह छोटे बच्चों को पहिनाते हैं।) रास्ते चलते फकीरी मिल गयी, न गुड़ बाँटना पड़ा और न मिठाई। अर्थात मुफ्त में काम हो गया।
गोंऊँ खेत में, लरका पेट में, पासनी कौ दिन धरई दो।
गेहूँ खेत में खड़े हैं, अभी कटकर नहीं आये, लड़का पेट में है, फिर भी अन्न- प्राशन का दिन निश्चित ही कर दो। किसी एक अनिश्चित कार्य की योजना पहिले से बनाना।
गोकुल गाँव की पेंड़ों1 न्यारो।
(1-रास्ता।) अपनी अलग निराली बात चलाने पर कहते हैं। 'सुंदर' कोउ न जान सकै यह गोकुल गाँव की पेंड़ोइ न्यारो।
गोबर के गनेस जी पटा पै बैठत बई खों नई फोर पाउत।
गोबर-गनेस जिस पटे पर बैठते हैं, उसको ही तोड़ने की सामर्थ्य नहीं रखते।