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अक्षर: ग

अक्षर 'ग' से शुरू होने वाली कहावतें

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गिर परे की डंडौत।

इच्छा न रहते हुए भी संयोगवश किसी एक अच्छे काम को करने का अवसर मिल जाना। अथवा हानि में से ही लाभ की कोई बात निकल आना।

गिरदौना की दौर मँगरे1 लौं।

(1-मगरी, छप्पर के ऊपर का वह हिस्सा जहाँ से वर्षा का पानी नीचे को लुढ़कता है।) जहाँ तक जिसकी पहुँच होती है वह वहीं तक जा सकता है। शक्ति से बाहर कोई काम नहीं कर सकता।

गिरा घेरें।

ग्रह घेरे हुए हैं बुरे दिनों का चक्कर है।

गिरी अटारी मढ़ा बिरोबर।

गिरी अटारी कोठे के बराबर। धनी आदमी बिगड़ेगा भी तो कहाँ तक गरीब होगा ?

गीलीं सूकीं सब जरतीं।

गीली-सूखी सब जलती हैं। चीज अच्छी हो या बुरी सब काम आ जाती है।

गुन न हिरानो, गुन गाहक हिरानो है।

संसार में गुण वालों की कमी नहीं, कमी है गुणग्राहकों की।

गुर के बाप कुलुआ।

गुड़ के बाप कोल्हू। अर्थात् सब उपद्रवों की जड़।

गुर खाने और पाग राखने।

अच्छा खा-पीकर भी अपनी इज्जत रखनी है।

गुर चुरउत की हँड़िया फूट गई।

गुड़ पकाने की हाँड़ी फूट गयी। बना-बनाया काम चौपट हो गया। लाभ का मुख्य साधन मिट गया।

गुर डिंगरियन घी उँगरियन।

गुड़ तो एक-एक डली करके ग्राहकों द्वारा उठाये जाने से नष्ट होता है और घी उँगलियों में लेने से।

गुर भरौ हँसिया।

ऐसी वस्तु जिसे न तो छोड़ते ही बने और न ग्रहण करते ही।

गुर में होयँ सवा, तऊ न करै रवा। नोन में होयँ पौन, तऊ न छाँड़े नौन।।

गुड़ में यदि सबाये भी होते हों तो भी उसे खरीद कर न रखे, परन्तु नमक में रुपये के बारह आने भी होते हों तौ भी उसका संग्रह करे, इसलिए कि गुड़ को चींटे खा जाते हैं, ग्राहक भी एक-एक डली करके उठा लेते हैं। जबकि नमक में नष्ट होने की ऐसी कोई संभावना नहीं रहती।

गुरई खों माँछी लगतीं।

गुड़ को ही मक्खियाँ लगती हैं।

गुरु बिन ज्ञान भेद बिन चोरी। बहुत नहीं तो थोरी थोरी।।

गुरु के बिना ज्ञान और भेद के बिना चोरी नहीं होती।

गुरू की विद्या गुरूई खों फली।

गुरू ने जो कुछ किया उसका परिणाम उनको ही भोगना पड़ा।