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अक्षर: ग

अक्षर 'ग' से शुरू होने वाली कहावतें

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गा गा कें भुवानी बुला लई।

जानबूझ कर विपत्ति मोल ले ली।

गाँज बरें, पूरन कौ लेखो।

घास के ढेर-के-ढेर तो जल जायें, और एक-एक पूले का हिसाब रखा जाय। फिजूलखर्ची करके अनुचित मितव्ययिता से काम लेना।

गाजर की पुंगी, बजी तौ बजी, नई तो टोर खाई।

ऐसे अवसर के लिए कहते हैं जब काम बन जाय तो अच्छा, न बने तो भी अच्छा।

गाजरन की तुला दई, बिमान की बाट हेरें।

गाजरों का तुलादान किया और प्रतीक्षा इस बात की कर रहे हैं कि स्वर्ग से विमान लेने आयेगा। नाममात्र का खर्च करके बड़े यश या लाभ की आशा करना।

गाजे-बाजे से आये हैं।

बड़ी धूमधाम से आये हैं (व्यंग्य में)।

गाड़र गाड़र मैं तोय जड़ाउर सिमाँउत, कई -- मोरी ऊन न कतर लियो।

गाड़र-गाड़र, मैं तेरे लिए जाड़े के कपड़े सिलवाऊंगा-गाड़र ने कहा- मेरी ऊन मत काट लेना। स्वार्थी व्यक्ति के उपकार से सतर्क रहना चाहिए।

गाड़ी अटक गई।

कार्य में विघ्न पड़ गया।

गाड़ी देख लाड़ी1 के पांव फूले।

(1-लड़ैती, लाड़ली लड़की।) सुविधा देखकर सब आराम चाहने लगते हैं।

गाड़ीवारे की नार जनम दुखिया।

क्योंकि गाड़ी वाले को प्रायः बाहर ही रहना पड़ता है और उसकी स्त्री घर में अकेली रहती है।

गाड़े सें पाड़ो जिन बाँधो।

गाड़ी से पड़ा मत बाँधो। बेतुका काम मत करो।

गायें गायें बियाव होत।

व्याह जैसा कठिन कार्य भी जब गाने-बजाने से हो जाता है तब दूसरे कार्य भी आसानी से किये जा सकते हैं। हिम्मत नहीं हारनी चाहिए।

गाये गीत कौ का गाइये। रँधे भात कौ का राँधिये।।

गाये गीत का पुनः क्या गाना ? रँधे भात का फिर क्या रांधना ? अर्थात् किसी विषय के पिष्‍टपेषण से क्या लाभ।

गाँव के खदरा तौ गाँव कौई अँदरा जानत।

गाँव के गड्ढे तो गाँव का ही अंधा जानता है। किसी स्थान की त्रुटियाँ तो वहाँ का असली निवासी ही जान सकता है।

गाँव को समधी, पोंदन की ओट।

गाँव के समधी की कहाँ तक लाज शरम की जाय ? सामना होने पर पीठ फेरी और निकल गये। निरंतर समीप रहने से मान-सम्मान कम होता है।

गाँव कौ जोगी जोगिया आनगाँव कौ सिद्ध।

आदमी की अपने घर में क़द्र नहीं होती, अथवा अपरिचित स्थान में पहुंचने पर गुणहीन व्यक्ति भी विद्वान् मान लिया जाता है।

गाँव में आई डोरी, का माते, का कोरी।

गाँव में लैनडोरी आयी है, तब फिर क्या महते और क्या कोरी, सबको ही रसद बेगार देनी पड़ेगी।