अक्षर: च
अक्षर 'च' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंचार कलेवा, आठ दुपर कीं, नौ व्यारी की देओ गोपाला। / इतने में कऊँ फेर परै तौ, जा लेओ कंठी, जा लेओ माला।। / चार चुअना1 कौ चौमासो।
(1-छप्पर में हो जाने वाला वह छिद्र जिससे वर्षा का पानी भीतर चुए। वर्षा के पानी का टपकना। 2- नकटयावना नाक कटना, बदनामी होना।) वर्षा ऋतु में यदि छप्पर दो चार जगह से टपकने भी लगे तौ भी वर्षा के चार मास तो किसी न किसी प्रकार बीत ही जाते हैं, इसी प्रकार विवाह में भी यदि किसी बात को लेकर कुछ झंझट या बदनामी हो तो भी विवाह तो होकर ही रहता है और उन बदनामी की बातों को भी लोग शीघ्र भूल जाते हैं। अतः चिन्ता किस बात की ?
चार चोर, चौरासी बनिया, एक एक कें लूटे।
चार चोरों ने चौरासी बनियों को एक-एक करके लूट लिया। एका न होने से हानि उठानी पड़ती है।
चार जनन नें धर दओ धरो। बिटिया पकरें बाप कौ गरो।।
चार आदमियों के सिखाने से लड़की बाप के गले से जाकर लग गयी। (कि मैं ससुराल नहीं जाऊँगी, अथवा मेरे लिए अमुक कार्य तुम कर ही दो) दूसरों के कहने-सुनने से जब कोई हठ पकड़ ले तब प्रयुक्त।
चार दिनां की चाँदनी फिर अँधियारी रात।
मन मोहन को हिलिबो मिलिबो दिन चार की चाँदनी है गई री। - ठाकुर
चार दिना खों मउआ हमें दै दो, फिर तौ तुमाय अई आयँ।
दूसरों को मूर्ख बना कर अपना काम बनाना। महुओं में जब फूल आते हैं तब दस-पाँच दिन के भीतर ही टपक कर समाप्त हो जाते हैं। उन्हीं दिनों के लिए कोई कहता है कि- महुए हमें दे दो, फिर तो तुम्हारे हैं ही। अर्थात उनका मुख्य लाभ हमें उठा लेने दो।
चार दिना तौ आयें नई भये, और सोंठ बिसाउन लगीं।
अभी चार दिन तो ससुराल आये नहीं हुए, और सोंठ अभी से खरीद कर रखने लगीं। किसी अनिश्चित कार्य का पहिले से सिलसिला बाँधना।
चार मइना ताल कौ, चार मइना हाल कौ।
चार महीने तो तालाब का पानी पिया जा सकता है, परन्तु वर्षा-ऋतु में कुएँ का ताजा पानी पीना चाहिए।
चाव घटे नित के घर जायँ, भाव घटे कछ मुख से माँगें, / रोग घटे कछु औषध खायें, ज्ञान घटे कुसंगत पायें। / चाहत की चाकरी कीजे। अनचाहत
जो प्रेम से रखे उसी की नौकरी करनी चाहिए।
चाँवर की कनी और भाला की अनी।
पकने में चावल यदि कच्चा रह जाय तो उसकी कनी भाले की नोंक की तरह हानिकर होती है।
चिंटा मारो, पानी कड़ौ।
चींटी को मारा तो पानी निकला। एक तो बुरा काम किया और कुछ मिला भी नहीं। गुनाह वे लज्जत। गरीब को सताने से कोई लाभ नहीं होता।
चिंटी होकें घुसे, मूसर होकें कड़े।
बातें बना कर अधिकार जमा लेना, और फिर मुश्किल से छोड़ना।