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अक्षर: च

अक्षर 'च' से शुरू होने वाली कहावतें

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चित्त चँदेरी, मन मालयें।

चित्त तो चँदेरी में और मन मालवे में। अस्थिर चित्त।

चित्त तुमाई, पट्ट तुमाई।

सब प्रकार से अपना ही हित देखना।

चित्त मोरी, पट्ट मोरी, अंटा1 मोरे बाप कौ।

(1-ऐसी कौड़ी जो न तो पूरी चित्त हो, न पट्ट।) ऐसे आदमी के लिए व्यंग में प्रयुक्त जो हर तरह से अपना ही लाभ चाहता हो।

चित्रा गोऊँ, अद्रा धान, न उनके गिरुआ, न इनके धाम।।

क्वाँर में चित्रा नक्षत्र में गेहूँ और भादों के महीने में आर्द्रा में धान बोने से न तो गेहूँ को गिरुआ लगता है और न धान को धूप सताती है।

चित्रा बरसें तीन गये, कोदों, तिली, कपास। / चित्रा बरस तीन भये, गोऊँ, सक्कर, मास।।

क्वाँर के महीने में चित्रा नक्षत्र में पानी बरसने से कोदों, तिली, कपास, इन तीनों की फसल को हानि पहुँचती है, और गेहूँ, ईख तथा उर्द को लांभ होता है।

चिरई के मों में सोनो।

चिड़िया के मुँह में सोना। बड़े आदमी के मुँह से जो निकल जाय वही ठीक।

चीकने गाल तिलनियाँ के, जरे-बरे भरभुँजिया के।

जो जैसा काम करता है उसके अनुसार उसका शरीर भी बनता है।

चीकने घैला।

ऐसा बेशर्म आदमी जिस पर कोई उपदेश काम ही न करे।

चीकनों मों करें फिरत।

चिकना मुँह किये फिरते हैं। केवल अपना स्वार्थ देखते हैं। अथवा छैल- चिकनियाँ बने हैं।

चीकनो मों सब कोऊ देखत।

बड़े आदमी का सब सम्मान करते हैं।

चील के घेंचुआ में माँस काँ ?

चील के घोंसले में माँस कहाँ ? उड़ाऊ खाऊ के पास पैसा कहां ?

चील से मँडरा रये।

किसी वस्तु की ताक-घात में रहने पर।

चुखरियाँ दुलत्तीं खेलतीं।

चूहे दुलत्ती खेलते हैं। घर में कुछ भी खाने को नहीं है। बहुत गरीबी का होना।

चुगल चुगली सें नईं चूकत।

चुगलखोर चुगली से नहीं चूकता।

चुगली लग जात, पै बिनती नईं लगत।

चुगलखोर चुगली करके काम बना लेता है, परन्तु प्रार्थना काम नहीं आती।