अक्षर: द
अक्षर 'द' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंदमरी के पान बनैनी खाय, कओ राम घर रये कै जाय ?
किसी कंजूस के घर का आदमी फिजूलखर्ची करे तो कैसे काम चले ? व्यंग्य में।
दर्जी के काज-बटन, सुनार की खटाई। / बरेदी की आई और कुरिया की पाई।।
दर्जी कपड़ों की सिलाई के मामले में काज-बटन का, सुनार गहनों के मामले में खटाई में पड़े होने का, बरेदी दूध के लिए गाय के आने का, और कोरी बुनाई के विषय में ताने-बाने के तैयार होने का विलंब बता कर ग्राहकों को टरकाता है।
दसरये के नीलकंठ।
ऐसा व्यक्ति जो बहुत कम दिखायी दे। किसी प्रिय मित्र से बहुत दिनों बाद भेंट हो तब कहते हैं।
दाई मीठे, ददा मीठे, किरिया की की खाँव।
असमंजस में पड़ के कोई काम न कर सकना।
दाँत गिरे उर खुर घिसे, पीठ बोझ नहिं लेय। / एसे बूढ़े बैल कों, कौन बाँध भुस देय।।
बूढ़े बैल के सम्बन्ध में।
दाँत दाँत तुम बत्तीस। हमरी तुमरी कौन रीस।। / हम कमायें तुम बैठे खाओ। मरती बेराँ संग न जाओ।।
दाँतों के संबंध में बूढ़े आदमियों का कथन।
दाँतन पसीना आ जेय।
दाँतों पसीना आ जायगा। अत्यन्त परिश्रम-साध्य कार्य के संबंध में।
दाता देय भंडारी कौ पेट फटै।
मालिक तो देने का हुक्म दे, परंतु खजांची को दुःख हो कि क्यों दिया जा रहा है। दानपुण्य के कार्य में जब कोई बाधक बने, अथवा दूसरे को देने से मना करे तब।
दाता वानी सूर नृप, मंत्री बैद सचान1। / जे सब निर्भय चाहिये, जामिन2 जुआ किसान।।
(1-श्येन पक्षी, बाज। 2-जामिनदार)
दाता सें सूम भलो तुरतईं देय जुवाब।
देने का बचन देकर जब कोई बहुत टरकायें तब।