अक्षर: न
अक्षर 'न' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंनारि मुई घर संपति नासी। मूंड़ मुड़ाये भये संन्यासी।।
ऐसे लोगों पर व्यंग्य जो स्त्री के मरने अथवा संपत्ति का नाश होने पर साधू हो जाते हैं?
नारी नर कौ नूर है, नारी जग कौ मान। नारी सें नर ऊपजे, ध्रुव, प्रहलाद समान।।
स्त्री सारी सृष्टि की जननी है जिसने ध्रुव और प्रह्लाद जैसे पुत्रों को जन्म दिया।
नाव चड़े झगड़ालू आवें, पैरत आवें साखी।
वादी और प्रतिवादी तो दोनों आराम से नाव पर चढ़ कर आ रहे हैं और गवाह तैरते आ रहे हैं। उल्टी बात। जब कोई आदमी व्यर्थ दूसरों के लिए कष्ट उठाये और घिसटा घिसटा फिरे तब।
नाव बड़े दरसन थोरे।
जब कोई किसी का बड़ा नाम सुन कर आये और उसे निराश जाना पड़े तब।
नावसें नाव बँदी।
एक दूसरे पर आश्रित हैं। नाव से नाव बँधी होने पर एक के डूबने पर दूसरी भी डूबेगी। अथवा सुरक्षित रहेगी।
निगत बनेना, सुपेती की फेंट बाँदें।
चलते तो बनता नहीं, रजाई की फेंट बाँध रखी है। सामर्थ्य से बाहर काम करने की हास्यजनक चेष्टा।
निन्नानवे के फेर में परबो।
1-रुपया कमाने की फिक्र सवार हो जाना। 2-घर-गृहस्थी की चिन्ता में पड़ जाना। 3-किसी ऐसी समस्या का सामने आ जाना जिसे आसानी से हल न किया जा सके।
निन्ने पानी जे पियें, हर्र भूँज कें खायँ। दूदन ब्यारू जे करें, तिन घर बैद न जायँ।।
जो प्रातः काल उठते ही निहार मुँह पानी पीते हैं, हर्र भूँज कर खाते हैं, और रात्रि में दूध का सेवन करते हैं वे कभी बीमार नहीं पड़ते।
निमान कौ पानी निमानें जात।
धरती के नीचे का पानी नीचे ही जाता है। जो वस्तु जहाँ की होती है वहीं चली जाती है।
नीम गुन बत्तीस, हर्र गुन छत्तीस।
नीम में बत्तीस गुण है, अर्थात वह बत्तीस रोगों में काम आता है और हर्र (हरड) में छत्तीस।