अक्षर: न
अक्षर 'न' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंनंगी नाचै, पूतै खाय, बेटा की सों जेई आय।
जब अपनी चाल-ढाल से कोई स्त्री स्वयं अपने को चरित्रहीन प्रकट करती फिरे तब।
नचनारी के कूले फरकत।
नाचने वाले के कूल्हे फरकते हैं। गुणी आदमी का गुण छिपा नहीं रहता।
नचबे चलीं और घूंघट घालें !
जब कोई नीचा काम करने पर ही उतारू हुए तो शरम क्या ?
नंद कें सोई नंद भई।
किसी की ननद की सास के लड़की पैदा हुई। इस पर भावज ने प्रसन्न होकर कहा- चलो, अच्छा हुआ, ननद के भी ननद पैदा हुई। अब इसे पता चलेगा कि ननद होती क्या वस्तु है।
नंद कौ नंदेऊ1, मेरो लगै न कोऊ।
(1-ननदोई, ननद का पति।) दूर के संबंधी के लिए उपेक्षा में कहते हैं।
नदी किनारें बगुला बैठो, चुन चुन मछरी खाय।
काल सबको धीरे-धीरे खाता रहता है। धूर्त आदमी को लक्ष्य करके भी कहते हैं।
नदी किनारे रूखड़ा जब तब होय बिनास।
जिसे हमेशा जोखिम का काम करना पड़ता हो उसके जीवन का क्या ठिकाना ?
नन्नां के आँगे ननयावरे की बातें।
अपने से अधिक जानने वाले के सामने अपनी जानकारी बघारना।
नन्नां1 छबीली ने मो लये।
(1-भाई या काका के लिए संबोधन।) नन्ना को छबीली ने मोह लिया। जब कोई अपने से बड़ा और समझदार दूसरों की बातों में आ जाय तब कहते हैं।