अक्षर: न
अक्षर 'न' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंनीम न मीठे होयँ, खाओ गुर घी सें।
यह कहावत इसी रूप में प्रचलित है। परन्तु उसका शुद्ध रूप है- नीम न मीठे होय, सींचो गुर घी सें।
नीर निमाने, अन्न कुठारे।
पानी तो निम्न-स्थल का अर्थात गहराई का, और अन्न कुठिया में रखा निर्दोष रहता है।
नैचे घर तुसार।
नीचे घर पर ही तुसार पड़ता है। गरीब को ही विपत्तियाँ अधिक सताती है।
नैनूँ कौ नाव, पिसान कौ दिया।
मक्खन या घी का तो केवल नाम है, दीपक आटे का बना है। काम कोई करै और यश किसी को मिले, अथवा जो वस्तु जैसी बतायी जाय वैसी न निकले तब कहते हैं।
नौ की लकरियाँ, नब्बे खर्च।
नौ रुपये की लकड़ियाँ लाने में नब्बे खर्च हो गये ! बेतुका खर्च।
नौ नगद न तेरा उधार।
तेरह उधार में बेचने की अपेक्षा नगद नौ में बेचना अच्छा। उधार का व्यापार ठीक नहीं।
नौ नेजा पानी चड़ौ, तौऊ न भींजी कोर।
नौ बर्छा पानी ऊपर चढ़ गया, फिर भी कोर नहीं भीगी। निर्लज्ज के लिए।
नौ मईना मताई के पेट में कैसें रये हुइओ।
नौ महीने माँ के पेट में कैसे रहे होगे ? चंचल और ऊधमी लड़कों के लिए।
नौ मन गुलिया1 चाटो।
(1-महुए की गुठली का तेल।) नौ मन गुली का तेल चाटते फिरोगे। अर्थात मारे-मारे फिरोगे। कोई पूछेगा नहीं।
नौ मूँड़ के हो जाओ। (तोऊ तुमाई बात न मानें)
तुम कुछ भी करो, फिर भी तुम्हारी बात नहीं मानेंगे। हठी लड़कों के लिए कहते हैं।
नौ सौ चूहा खाकें बिलाई तप कों चली।
धार्मिकता या संयमशीलता का ढोंग करने वाले के लिए।
नौकरी तौ नौकरी, ना करी तौ ना करी, हाँ करी तौ हाँ करी।
नौकरी करै तो मन लगा कर करे, अन्यथा करना नहीं चाहिए।
नौकरी है कै भाईबंदी।
जब नौकर बहुत गैरहाजिरी करे अथवा ठीक ढंग से काम न करे तब।
न्यारो पूत परौसी दाखिल1।
(1-शरीक, मिला हुआ।) घर से अलग हुआ लड़का पड़ौसी के समान हो जाता है। एक बार किसी से संबंध-विच्छेद हो जाने पर फिर उससे कोई मतलब नहीं रहता।