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बुंदेलखंड विश्वकोश

अक्षर: प

अक्षर 'प' से शुरू होने वाली कहावतें

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पेट में उरदा से चुर रये।

पेट में उर्द से पक रहे हैं। अनिष्ट की आशंका से घबराना। बहुत चिन्तित होना।

पेट में रई सो फिर रई।

पेट में मबानी सी फिर रही है। हृदय धड़क रहा है। घबराहट हो रही है।

पेट रैबो।

अवैध रूप से गर्भ रह जाना।

पेट लगौ फटबे, खैरात लगी बटबे।

आपत्ति में पड़ने पर ही मनुष्य दान-पुण्य करता है।

पेट सब कराउत।

पेट के लिए अच्छे-बुरे सब कर्म करने पड़ते हैं।

पेट सबकें लगौ।

पेट की चिन्ता सबको करनी पड़ती है।

पेट सें कोऊ सीक कें नईं आऊत।

पेट से कोई सीख कर नहीं आता। परिश्रम और अभ्यास से ही मनुष्य सब सीखता है।

पेड़े से बैर, पतोरन सें नातो।

काम की वस्तु छोड़ कर निकम्मी ग्रहण करना। वृक्ष से शत्रुता और पत्तों से प्रेम।

पैंड़ पैंड़ पै कुनबा डूबे, आँगें धरमराज दरबार।

पग-पग पर तो कुनबा डूब रहा है, और आगे धर्मराज का दरबार है, जिसमें हिसाब देना है। किसी काम को करने के मार्ग में जब बाधाएँ पर बाधाएँ आ रही हों, और काम बिलकुल सिर पर आ गया हो तब प्रयुक्त।

पैरी ओढ़ी घन दिपै, लिपौ पुतौ घर खिले।

गहने-कपड़ों से सजी स्त्री शोभा देती है, लिपा-पुता घर अच्छा लगता है।

पैली छेरी, दुसरी गाय, तिसरी भैंस दुही न जाय।

बकरी पहले ब्यान में, गाय दूसरे में, और भैंस तीसरे में अच्छा दूध देती है।

पैली ताप तुरइया बसी, खीरा देखें खिलखिल हँसी। / जब लओ फूट कौ नाव, डंका दैकें गेरो गाँव।।

ज्वर का पहला आगमन तुरइया के साथ होता है, खीरा देख कर तो वह बहुत प्रसन्न होता है और फूट का नाम लेते ही डंके की चोट गाँव घेर लेता है। अर्थात क्वाँर, कार्तिक के महीने में तुरइया खीरा और फूट के खाने से ही ज्वर फैलता है। लोक विश्वास।

पैली बिपत बड़ो होय नाव। दूजी बिपत सड़क कौ गाँव।। / तीजी बिपत धनऊँ से हीन। सब बिपतन में बिपता तीन।।

पहिली विपत्ति तो यह कि नाम बड़ा हो, दूसरी यह कि सड़क के किनारे गाँव हो, तीसरी यह कि पैसा पास में न हो, सब विपत्तियों में ये तीन ही बड़ी विपत्तियाँ है।

पैलें अपने मों में मुसीका1 देओ।

(1-वह जालीदार पट्टी जो बैलों के मुँह पर इस उद्देश्य से बाँधी जाती है कि खलिहान में काम करते समय वे अनाज पर मुँह न मारें।) पहिले अपना मुँह तो बंद करो। (फिर दूसरों से चुप रहने को कहना।)

पैलें आरसी में अपनो मों तौ देखो।

मोहन हँसबो होत उजा को, छोड़ो ऐसो साको। / हों कुलबघू साव की बेटी, रहनो बड़े मजा को। / बात न कहो हाथ न पकरो, जौ है काम रजा को। / ईसुर स्याम आरसी लैकें, अपनो मुख तौ ताको। - ईसुरी

पैलें घर, पाछें बाहर।

पहिले अपना घर सँभाले, फिर बाहर।