अक्षर: प
अक्षर 'प' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंपूँछता नर पंडित।
दूसरों से पूछ कर काम करे वही पंडित है। पूछने से ही आदमी का ज्ञान बढ़ता है।
पूँछबे में का लगत ?
पूछने में क्या लगता है? किसी से कोई बात पूछने में संकोच क्या ?
पूत के नाव पुताँड़ी1 भली।
(1-चौका पोतने के काम आने वाली हाँडी।) लड़का चाहे जैसा बुरा हो, परन्तु न होने से तो अच्छा।
पूत के पाँव पलना में दिखा परत।
लड़कपन के आचरणों से ही इसका पता चल जाता है कि आगे चल कर लड़का कैसा निकलेगा। किसी कार्य के लक्षण पहिले ही से दिखायी पड़ जाते हैं।
पूरब के भान पच्छिम में उगन लगें।
किसी काम को न करने अथवा किसी के आगे न झुकने की प्रतिज्ञा।
पूरब जनम के फल भोग रये।
पूर्व जन्म के फल भोग रहे हैं। प्रायः बीमार कहता है।
पूरी खेती उनकी कहें, जो हल अपने हात गहें। / आदी खेती उनकी कहें, जो नित हलके संग रहें। बये बीज उपजे नहिं तहाँ, जो पूछे कै हर है
खेती अपने हाथ से ही होती है।
पूस जाड़ो न माव जाड़ो, जब पानी तबई जाड़ो।
सर्दी न तो पूस में पड़ती है और न माघ में, जब पानी बरसे तभी समझो सर्दी।
पूस बोवे, पीस खावे।
पूस में कोई अनाज बोने की अपेक्षा तो अच्छा यह है कि उसे पीस कर खा ले।
पेट की आग पेटई जानत।
पेट की आग पेट ही जानता है। भूखे का कष्ट भूखा ही जानता है।
पेट की आसा सब करत।
पेट के लिए ही सब काम किया जाता है। जब किसी नौकर या मजदूर को मेहनताना कम मिलता है तब।
पेट के पथरा प्यारे होत।
पेट के पत्यर भी प्यारे होते हैं, फिर लड़का चाहे जैसा निकम्मा हो, वह तो प्यारा होगा ही।
पेट भरे से काम गकरिया1 काऊ की।
(1-हाथ की बनी मोटी रोटी।) रोटी किसी अनाज की हो, पेट भरने से काम।