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बुंदेलखंड विश्वकोश

अक्षर: प

अक्षर 'प' से शुरू होने वाली कहावतें

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पानी में आग लगाबो।

जहाँ झगड़ा संभव न हो वहाँ झगड़ा करा देना।

पानी में परबो।

नष्ट होना। बरबाद होना।

पानी में मीन प्यासी।

साधन सम्पन्न होते हुए भी किसी वस्तु के लिए तरसना।

पानी सें पतरो का ?

कहीं माँगने पर पानी भी न मिले तब प्रयुक्त।

पाप-पुन्‍न को कोऊ भागी नईं होत।

पाप-पुण्य का फल अपने ही को मिलता है।

पापी पेट सब कराउत।

पेट के लिए सब करना पड़ता है।

पार फट परौ।

पहाड़ फट पड़ा। अचानक कोई भारी विपत्ति आ पड़ना।

पार भये तौ पार हैं, डूब गये तौ पार।

परिणाम हर हालत में अच्छा होगा, यह सोच कर किसी काम को करने का निश्चय करना।

पारवा दूर केई सुहावने लगत।

पहाड़ दूर के ही सुहावने लगते हैं।

पारवा सें मूँड़ मारबो।

असंभव कार्य को करने का प्रयत्न करना।

पारे1 से खटको नईं होत।

(1-पारा, बत्तंन ढकने की मिट्टी की तश्तरी।) पूर्ण निस्तब्धता है। लड़ाई-झगड़ा शान्त है। किसी को किसी से बोलने की हिम्मत नहीं पड़ती।

पाँव में भौंरी है।

ऐसे आदमी के लिए कहते हैं जो किसी एक स्थान पर जम कर न बैठ सके।

पाँव में सनीचर है।

एक स्थान पर सुखपूर्वक न बैठ सकना। घूमते ही रहना।

पाँवन में का माँदी रचायें ?

पैरों में क्या मेंहदी रचाये हो, (जो इतना सुस्त चलते हो।) शीघ्र काम न करने पर प्रयुक्‍त।

पावन1 गये भसावन। सैरो2 गयें बसंत।।

(1-त्यौहार। 2-एक प्रकार के गीत जो बसंत में गाये जाते हैं।) बे अवसर का काम। समय के बाद पर्व नहीं मिलता, सैरा बसंत के बाद अच्छा नहीं लगता।

पाँसो परै सो दाव, राजा करै सो न्याव।

भाग्यवश जो सामने आ जाय उसे स्वीकार करना पड़ता है।

पाँसो परै, अनाड़ी जीते।

पाँसा ठीक पड़ने से अनाड़ी भी जीतता है। अथवा पाँसा ठीक पड़ने से ही अनाड़ी जीतता है। भाग्य अनुकूल होने से ही कार्यसिद्धि होती है।