अक्षर: प
अक्षर 'प' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंपिठी1 सी बाँटबो।
(1-उर्द की पानी में धुली और बँटी हुई दाल।) किसी को खूब मारना, मरम्मत करना।
पिंड में सो ब्रह्माण्ड में।
मनुष्य के शरीर में जो ईश्वर निवास करता है वही ब्रह्मांड में व्याप्त है।
पीठ की मार मारै पेट की न मारै।
किसी को शारीरिक दंड भले ही दे, परन्तु रोजी न छीने।
पीठ में लट्ठ भवानी करें, सबरो घर पूजा कों चले।
आपत्ति आने पर ही लोग भगवान का स्मरण करते हैं।
पीपरामूर1 की जर हो गये।
(1-पीपलामूल, एक प्रसिद्ध औषधि।) कोई आत्मीयजन या घनिष्ट मित्र जब बहुत कम दिखायी दे तब प्रयुक्त।
पीसवे कों चल्लोसन1, गावे कों सीता हरन।
(1-चोकर।) दिखावट तो बहुत, परंतु सार कुछ नहीं।
पुन चंदन, पुन पानी; सालिगराम घुर गये तब जानी।
किसी काम को बार-बार करके अंत में उसे बिगाड़ देना।
पुन्न करौ बीस बिसी, खोज मिटाओ तीस बिसी।
दूसरों का उपकार तो उतना नहीं किया, जितनी स्वयं अपनी हानि कर ली !
पुन्न की जर पताल नों।
पुण्य की जड़ गहरी होती है। किया हुआ सत्कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाता।
पुरखा तौ मर गये क्वाँरे, नाती (अ) न के नौ नौ ब्याव।
बहुत डींग हाँकने वाले के लिए।
पुराने पापी।
ऐसा आदमी जो दुनिया के सब रंग-ढंग देख चुका हो; किसी विषय में जिसका अनुभव बहुत दिनों का हो। (व्यंग्य में)।
पुराने मठ पै कलई करबो।
किसी पुरानी वस्तु को नयी बनाने का वृथा प्रयास करना। बुढ़ापे में जवान बनने की चेष्टा।
पुरुस (अ) ई पारस है।
पुरुष ही पारस है। एक मनुष्य ही दूसरे को अच्छा बनाता है।
पुरुस की माया, बिरछ की छाया।
संसार में पुरुष की ही माया है। पुरुष ही संसार का श्रेष्ठतम प्राणी है, अथवा उसको लेकर ही यह संसार-चक्र चल रहा है।
पूँछत पूँछत लंकै चले जात।
किसी स्थान का रास्ता न भी मालूम हो तौ भी आदमी पूंछते-पूंछते वहाँ जा सकता है।