अक्षर: ब
अक्षर 'ब' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंबोलबे में सार नइयाँ।
जब किसी की कोई बात न सुनी जाय, अथवा कुछ कहना ही व्यर्थ हो तब।
ब्याज घोड़ा से अँगारीं चलत।
ब्याज घोड़ा से तेज चलता है। दिन रात बढ़ता रहता है।
ब्याज, घूँस, दच्छना, पाछे परें कुच्छना।
ब्याज, घूँस और दक्षिणा का रुपया पिछड़ जाने पर फिर नहीं मिलता।
ब्याय नइयाँ तौ बरातें तौ करीं।
स्वयं हमारा विवाह नहीं हुआ तो क्या ? परन्तु बरातें तो की हैं। कोई काम स्वयं नहीं किया तो क्या हुआ, उसकी जानकारी तो है।
ब्यारी1 कबहु न छोड़िये, ब्यारी से बल जाय। / जो ब्यारी औगुन करै (तौ) दुपरे थोरो खाय।।
(1- ब्यालू; रात्रि का भोजन।)
ब्याव की बारा बरसें बाट हेरी, चलाए1 की दमदम पारें।
(1-चलाव, द्विरागमन; गौना; विवाह के बाद बहू को लेने जाना।) विवाह की बारह वर्ष तक प्रतीक्षा की, गौने के लिए आफत मचाये है कि अभी हो जाये। किसी काम को पूरा होते हुए देख कर उसके लिए उतावली मचाना।
ब्याव गाये गाये कौ और खाये खाये कौ।
विवाह में गाना-बजाना और खाना-पीना ही मुख्य है। ये न हों तो विवाह किस काम का ?
ब्याव न जानों हाँसी खेल। उड़ जै कुला बिसाउतन तेल।।
ब्याह को हँसी खेल मत समझो, तेल इकट्ठा करने में ही टोपी उड़ जायगी। तात्पर्य यह कि ब्याह में नाना प्रकार की कठिनाइयाँ सामने आती हैं।
ब्याव पाछें पत्तर भारी हो जात।
ब्याह के बाद एक पत्तल का खर्च भी भारी हो जाता है। खर्च में खर्च नहीं आँसता।
ब्याव बिगरौ सो बिगरौ, घरइयन कों तौ जुआँ दो।
ब्याह बिगड़ा सो बिगड़ा, घर के लोगों को तो भोजन करा दो ! जो हुआा सो हुआ, भूखे बैठे रहने से क्या लाभ ?
ब्याव-बरात कौ भरों, जितै चाय परों।
ब्याह-बरात में कोई किसी को नहीं पूछता। जहाँ जगह मिले वहाँ लेटो।
विद्या पड़े सजीवनी निकरे मत के हीन। / तुलसी बिना विवेक के बन में खाये तीन।।
इसकी एक कथा है कि एक बार तीन ब्राह्मण-पुत्र काशी से संस्कृत पढ कर अपने घर को लौट रहे थे। वे संजीवनी विद्या जानते थे। रास्ते में एक जंगल में उन्हें एक मरा हुआ शेर मिला। उस पर अपनी विद्या की परीक्षा करने के लिए उसे उन्होंने जीवित कर दिया। परन्तु शेर जैसे ही जीवित हुआ उन तीनों को वह एक ही झपट्टे में खा गया। यह संजीव जातक है।