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बुंदेलखंड विश्वकोश

अक्षर: म

अक्षर 'म' से शुरू होने वाली कहावतें

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मों माँगे दाम नई मिलत।

किसी वस्तु के मुंह-माँगे दाम नहीं मिलते।

मों में आई सो धर कई। (अथवा कै दई)

मुँह में आया सो कह दिया। बिना सोचे-विचारे कहने पर प्रयुक्त।

मों में मुसीका1 दयें रओ।

(1- सुतली की जालीदार पट्टी जो खलिहान में बैलों से काम लेते समय उनके मुँह पर बाँध दी जाती है।) अर्थात चुप रहो। बोलो मत। मौन धारण किये रहो।

मोंटी खाल दूद की हान। पतरी खाल दुधारू जान।।

मोटी खाल वाली गाय कम दूध देती है। पतली खाल वाली दुधार होती है।

मोय न पूँछे कोय, मैं लालन की मौसी।

बीच में जबर्दस्ती आ धमकने वाले को लक्ष्य करके व्यंग्य में।

मोय बूझ, मैं खरा।

अपने को बहुत स्पष्ट-वक्ता बताने वाले पर कटाक्ष।

मोरी खिलाई लुखरो और मोई से लोखरफंद।

मेरी खिलाई हुई लोमड़ी और मुझसे ही चालबाजी !

मोरी दोऊ मीठी।

मेरी दोनों मीठी अपने को झूठा संतोष प्रदान करना।

मोरे आँगे कौ भो लड़इया और मोई सें अब्बे-तब्वे।

मेरे सामने का पैदा हुआ गीदड़ और मुझसे ही अबे-तबे ?

मोरे खुदाय अबरा-डबरा, मोई सें लगे बुलयान !

मेरे खुदाये हुए तो तालाब और मुझसे ही ऊँचे बोल ! जिसकी वस्तु वही काम में न ला सके ?

मोरे घर से आग ल्याई, नाव धरो बैसाँदुर1 !

(1 वैश्वानर, वैदिक अग्नि का एक नाम।) दूसरे के पास से लायी गयी वस्तु को अपनी बता कर उपस्थित करना, और उसके लिए दूसरे का एहसान न मानना।

मोरे तो मम्मा बीच हैं।

मेरे तो मामा मध्यस्थ है। किसी काम में दूसरे की ओट लेना।

मोरें पीसे पिसनारी, मैं राउर1 पीसन जाँव !

(1-राजपुर। राजमहल। ठाकुरों का घर या मुहल्ला।) मेरे यहाँ तो पिसनहारी पीसती है और मैं ठाकुरों के घर पीसने जाऊँ !

मोरे भरोसे रइयो ना, और बिरानो खान जइयो ना।

मेरे भरोसे रहना मत, और दूसरे के यहाँ भी खाने जाना मत।

मोरें है सो कोऊ कें नइयाँ।

मेरे है सो किसी के नहीं। अपनी वस्तु का अभिमान करने वाले के लिए कहते हैं।