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अक्षर: म

अक्षर 'म' से शुरू होने वाली कहावतें

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मूसर सें मूँड़ मारबो।

मूर्ख के साथ समय नष्ट करना।

मूसर होतो तौ पाउनों का रिसाकें चलो जातो ?

मूसल होता तो क्या पाहुना अप्रसन्न होकर चला जाता ? घर में जब कोई वस्तु न हो और उसके लिए किसी को इन्कार करना पड़े तब विनोद में प्रयोग करते हैं।

में दूला की मौसी, धर नेग कौ टका।

जब कोई आदमी यह बताये कि 'मैं भी कुछ हूँ' तब व्यंग्य में उसके लिए कहते हैं।

मेघ समान जल नहीं, आप समान बल नहीं।

नास्तिमेघसमंतोयं नास्तिचात्मसमंबलम्। / नास्तिचक्षुः समंतेजो नास्तिधान्यसमंत्रियम्।। - चाणक्य नीति

मैन के पुतरा हो रये।

मोम के पुतले हो रहे हैं। कोई बहुत थोड़ी सी बात पर रूठ जाना या आँसू गिराने लगना।

मैर कीं, न माउर कीं।

न मैंहर में सम्मिलित होने की, और न माहूर लगवाने की। अर्थात किसी गिनती में नहीं। विवाह में एक परिवार के लोग ही मैंहर (मातृका) की पूजा में भाग लेते हैं। इसी प्रकार माहुर भी उस अवसर पर खास-खास स्त्रियों को ही लगाया जाता है।

मों आवो कौर अपनों नईं होत।

मुँह तक आया कौर भी अपना नहीं होता। अर्थात वह भी कभी-कभी हाथ से छिन जाता है।

मों कौ कौर नाक में नईं जातो रत।

मुँह का कौर नाक में नहीं चला जायगा। प्रकृति-विरुद्ध कोई काम नहीं होता। प्रायः उस समय कहते हैं जब रात्रि के समय किसी को एकाध मिनट के लिए अँधेरे में बैठ कर भोजन करने का मौका आ जाय और वह शिकायत करे कि रोशनी कहाँ गयी।

मों चीकनो, पेट खाली।

ऊपर से टीम-टाम बनाये रखने वाले के लिए।

मों दूर कै थापर।

जो काम करना है किया जा सकता है। कौन सी बाधा है ?

मों देख कें टींका करबो।

अलग अलग आदमियों से अलग-अलग तरह का बर्ताव करना। पक्षपात से काम लेना।

मों देखी सब कत।

मुँह देखी सब कहते हैं। सब एक दूसरे का मुलाहिजा करते हैं।

मों धो राखो।

मुँह धो रखो। अर्थात तुम जो चाहते हो वह नहीं हो सकता, अथवा तुम इसके योग्य नहीं।

मों पै कछू, पीठ पछारूँ कछू।

मुँह पर कुछ और पीठ पीछे कुछ और कहना।