अक्षर: म
अक्षर 'म' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंमान्स देख कें बात करी जात।
मनुष्य देख कर बात की जाती है। जो मनुष्य जैसा हो उससे वैसी बात करनी चाहिए।
मार कें भग जइये, खाकें पर रइये।
मार के भाग जाना चाहिए, खाके लेट जाना चाहिए।
मार1 जोतिये, कुले ब्याइये।
(1-काले रंग की उपजाऊ जमीन।) खेती करना चाहिए मार की जमीन में, विवाह करना चाहिए उच्च कुल में।
मारै और रोउन न देय। / मारे मरें निरसई1 के, मूँछन कों घी चुपरें।
(1-विपत्ति, गरीबी।) विपत्ति के मारे मरते हैं, परन्तु मूँछों में घी चुपड़ते हैं।
मिठया की बिलइया हो रये।
हलवाई की बिल्ली हो रहे हो। जब कोई किसी बड़े आदमी के यहाँ अपनी घुसपैठ करके खूब माल-टाल उड़ाये तब कहते हैं।
मियाँ बीबी राजी, तौ का करै काजी। / मियाँ छैल-छटाक, बीबी धूल फटाक।
मियाँ छैल चिकनिया बने फिरते हैं, बीबी धूल फटकती है।
मियाँ मरें आफत की ठेल। बीबी कहें शिकारे खेल।।
मियां तो आफत के मारे मरते हैं, बीबी कहती है-यौवन का रस लूटो।
मीठो और भर कठौती।
अच्छी वस्तु चाहें और वह भी बहुत, ये दोनों एक साथ नहीं होते।