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अक्षर: म

अक्षर 'म' से शुरू होने वाली कहावतें

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मीठो मीठो गप्प, कर (अ) ओ कर (अ) ओ थू।

अच्छी वस्तु तो अपने लिए चुन लेना और खराब दूसरों के लिए छोड़ देना।

मीन-मेख करबो।

बाल की खाल निकालना। मुहूर्त देखने के लिए मीन-मेष आदि राशियों का सूक्ष्म विचार किया जाता है। उसी से कहावत बनी।

मुँगरिया सर गई तौ भड़फोर लाक तोई बनी।

मोंगरी सड़ गयी है, फिर भी भाँड़े-बासन फोड़ने के लायक तो अब भी बनी है।

मुँड़चीरापन करबो।

मुँड़चीरा फकीरों की तरह किसी काम को करवाने के लिए मूँड़ चीरने की धमुक्री देना। धरना देकर बैठना।

मुंडी गैया सदा कलोर।

बिना सींगों की गाय सदा बछिया ही जान पड़ती है। घर से बेफिक्र और अल्हड़ आदमी के लिए कहते हैं।

मुफत कौ चंदन घिस मोरे नंदन।

मुफ्त का माल उड़ाने वाले के लिए कहते हैं।

मुफत कौ माल किये बुर (अ) ओ लगत।

मुफ्त का माल किसे बुरा लगता है? किसी को नहीं।

मुरगी कों तकुअई कौ घाव भौत।

मुरगी को तकुआ का घाव ही बहुत। गरीब आदमी थोड़ी भी हानि सहन नहीं कर सकता।

मूँछन कौ झूला डारबो।

मूँछों का झूला डालना। हास्य-जनक काम करना।

मूँछन पै ताव दैबो।

अभिमान से मूँछ मरोड़ना। अकड़ दिखाना।

मूँड़ कौ मारौ बिच्छू काँ लौं जेय।

कोई आदमी गहरी चोट कहाँ तक सहन कर सकता है।

मूँड़ न सई कपार सई।

मूँड़ न सही कपार सही। अर्थात जो बात तुम कह रहे हो वही हमने भी कही। दोनों में कोई अंतर नहीं।

मूँड़ मुड़ाउतनईं ओरे परे।

कार्य आरम्भ करते ही विघ्न हुआ।

मूरख की सब रैन, चतुर की एक घड़ी।

मूरख के साथ घंटों रहने की अपेक्षा चतुर के साथ एक घड़ी रहना अच्छा। अथवा मूख जिस काम को घंटों में नहीं कर सकता, चतुर उसे कुछ क्षणों में निपटा देता है।

मूरख कों समझाइये, ज्ञान गाँठ को खोइये। / मूरख से दुख रोओ, रोटी सें घी खोओ।

मूर्ख के सामने अपना दुखड़ा रोना उसी तरह व्यर्थ है जैसे मोटे अनाज की रोटी के साथ घी बरबाद करना।

मूरख हृदय न चेत जो गुरु मिलहिं विरंचि सम।

मूर्ख आदमी को ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते।

मूरखन कें का सींग होत ?

मूर्खों के क्या सींग होते हैं?