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अक्षर: स

अक्षर 'स' से शुरू होने वाली कहावतें

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सन घनों, बन बेगरो, मेंढक फंदें ज्वार।/ पेड़ पेड़ पै बाजरा, करै दलुद्दर पार।।

सन घना, कपास छिरबिर्रा, मेंढक की कुँदान जितनी दूरी पर ज्वार और कदम कदम पर बाजरा बोना चाहिए।

संपत से भेंट नई दलुद्दर से लठालठी।

बिना प्रयोजन झगड़ा करने पर कहते हैं।

संपत सें भेंट नईं दलुद्दर1 की जेट2 काय को छोड़ो।

(1-दरिद्रता, गरीबी। 2-पोटली, ढेरी) जो मिले वही लो।

सब एकई थैलिया के चट्टा-बट्टा।

सब एक से हैं। चालाकी में कोई कम नहीं।

सब गुन भरी बेंतरा1 सोंठ।

(1-एक प्रकार की सोंठ।) धूर्त के लिए व्यंग्य में।

सब धरौ रै जैये।

सब धरा रह जायगा। हद से बाहर काम करने पर चेतावनी के रूप में।

सब धान बाईस पसेरी।

जहाँ अच्छे और बुरे, मूर्ख और पंडित, न्याय और अन्याय का कोई विचार न हो वहाँ कहते हैं।

सब बेटा के बाप।

जहाँ सब अपनी-अपनी हुकूमत चलायें।

सब से मीठी भूँक।

भूख में सब वस्तु मीठी लगती है।

सबई किसानी हेटी। अगनइयाँ पानी जेठी।।

रबी की फसल को अगहन में पानी मिल जाय तो समझो बड़ा काम हुआ।

सबरी निपुर गई।

सब कलई खुल गयी। बहुत चलायो पर एक नहीं चली।

सबै कुलच्छन बाँड़ी पूँछ।

बंडी गाय में बड़े ऐब होते हैं। धूर्त्‍त के लिए कहते हैं।