अक्षर: स
अक्षर 'स' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंसन घनों, बन बेगरो, मेंढक फंदें ज्वार।/ पेड़ पेड़ पै बाजरा, करै दलुद्दर पार।।
सन घना, कपास छिरबिर्रा, मेंढक की कुँदान जितनी दूरी पर ज्वार और कदम कदम पर बाजरा बोना चाहिए।
संपत सें भेंट नईं दलुद्दर1 की जेट2 काय को छोड़ो।
(1-दरिद्रता, गरीबी। 2-पोटली, ढेरी) जो मिले वही लो।
सब धरौ रै जैये।
सब धरा रह जायगा। हद से बाहर काम करने पर चेतावनी के रूप में।
सब धान बाईस पसेरी।
जहाँ अच्छे और बुरे, मूर्ख और पंडित, न्याय और अन्याय का कोई विचार न हो वहाँ कहते हैं।
सबई किसानी हेटी। अगनइयाँ पानी जेठी।।
रबी की फसल को अगहन में पानी मिल जाय तो समझो बड़ा काम हुआ।
सबरी रामायन हो गई, इनें जोई पतौ नईं के राम राच्छस हते कै रावन।
सब बात सुन कर भी न समझना।
सबै कुलच्छन बाँड़ी पूँछ।
बंडी गाय में बड़े ऐब होते हैं। धूर्त्त के लिए कहते हैं।