अक्षर: स
अक्षर 'स' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंसरमीलो माँगे नईं, गर्वीलो देय नईं।
शर्मीला माँगता नहीं, और गर्वीला बिना माँगे देता नहीं।
सरौ सूत दर्जी कों खोर।
सड़ा हुआ कपड़ा और दर्जी को दोष। अपनी त्रुटि कोई नहीं देखता।
सव स्वाँग बन जात, अकेलें रुपैया कौ स्वाँग नईं बनत।
रुपये का काम रुपये से ही निकलता है।
ससरार सुख की सार, जो रये दिना दो चार।
ससुरार सुख की सार, पै रहे बिना दो चार। जो रहे मास पखवार, हाथ में खुरपी बगल में फार।
ससुर खाँ परी हार-फार की, बऊ खाँ परी खँगवार1 की।
(1-गले में पहिनने का चाँदी या सोने का आभूषण, खँगोरिया, हँसुली।) ससुर को तो हल-बखर की पड़ी है और बहू को इस बात की कब मेरी हँसुली बने। सबको अपनी-अपनी पड़ी रहती है।
सहर चंदेरी मो मनवाला। तिरिया राज, खसम पनहारा1।।
(1-पानी भरनेवाला, ढीमर, कहार।) चँदेरी नगर मेरी पसंद का है। वहाँ स्त्री का तो राज्य है और राजा पनहारा है। अंधेरगदीं से जहाँ पूरा लाभ उठाने का अवसर हो वहाँ के लिए कहते हैं।
साइत तें सुतार भलो।
किसी काम का मुहूर्त देखने की अपेक्षा उसका प्रबंध ठीक करना अच्छा।
साके1 कौ ब्याव, सनोरन1 कौ उजयारौ।
(1-साका कीर्ति यश, 2-सनोरा सन की पतली लकड़ी जो शीघ्र जल जाती है।) विवाह की बड़ी ख्याति परन्तु सनोरों का उजियाला ! धूमधाम तो बहुत, काम कुछ नहीं।
साँची बात सादुल्ले1 कयें, सब के मन सें उतरे रयें।
(1-नाम विशेष। यह औरंगजेब का इतिहास-प्रसिद्ध सेनापति और मंत्री सादुल्ला खां भी हो सकता है। वह अपनी न्यायप्रियता और निर्भीकता के लिए विख्यात है।) सच बात कहने वाले से सब नाराज रहते हैं।
साँचे कौ जमानो नइयाँ।
सच्चे का जमाना नहीं। जब कोई सच कहे और उसकी बात न मानी जाय तब कहते हैं।
साजन-साजन ढुर मिले झूठे परे बसीठ।
लड़ाई-झगड़े के बाद दो मित्र तो आपस में मिल जाते हैं। परन्तु बीच में भिड़ाने वाले बदनाम होते हैं।
साँझे धनुस सकारे पानी।
संध्या को यदि आकाश में इन्द्रधनुष दिखायी दे तो दूसरे दिन पानी बरसता है।
साँड़ साँड़ लरें बारी कौ भुरकन होवे। / सांड़न साँड़न की लड़ाई।
बड़ों बड़ों की लड़ाई।
साधुअन कों स्वाद सें का काम ?
साधुओं को स्वाद से क्या काम ? अपनी निस्पृहता दिखा कर काम बनाना।