अक्षर: स
अक्षर 'स' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंसाधू निकरे सैर कों दोइ दीन की खैर। / ना काऊ से दोस्ती, ना काऊ से बैर।।
भीख मांगते समय साधू कहते हैं।
साँप के गोड़े साँपई कों दिखात।
साँप के पैर साँप को ही दिखायी देते हैं। अपनी विपत्ति आदमी आप ही जानता है, दूसरा नहीं जान सकता।
साँप के फन से देअ खुजाउत।
साँप के फन से देह खुजाते हैं। जानबूझ कर अनर्थ करते हैं।
साँप के मैर मरे लौं आऊत।
मरते-मरते तक साँप के विष की लहर शरीर में दौड़ती है। दुष्ट और विश्वासघाती का आक्रमण भयंकर होता है।
साँप मरै न लाठी टूटे।
साँप मर जाय, पर लाठी न टूटे। काम बन जाये और हानि भी न हो। युक्ति से काम लेना।
साबन घुरिया भादों गाय, माघ मास जो भैंस ब्याय, जीसें जाय कै खसमें खाय।
लोगों का विश्वास है कि यदि सावन में घोड़ी, भादों में गाय, और माघ मास में भैस बियावे तो या तो स्वयं मर जाती है या उसका मालिक मर जाता है।
साबुन-सज्जी निबुआ नोंन। और दाद की ओखद कौन ?
साबुन, सज्जी, नीबू का रस तथा नमक इनको मिला कर लगाने से दाद अच्छी होती है।
साँमू आँयें नार1 नई खात।
(1-नाहर, शेर।) सामने पहुँच जाने पर शेर भी नहीं खाता। आत्म-समर्पण कर देने पर कठोर से कठोर आदमी का हृदय पसीज जाता है।
सारी1 न साराज2, सासई से ररी3।
(1-पत्नी की बहिन। 2-सलहज, साले की स्त्री। 3-रली, हँसी-मजाक) साली और सलहज नहीं तो सास से ही मजाक। अपने से बड़े से हँसी-मसखरी करने पर।
सावन चलै पुरवाई, तालन तिली बुआई।।
सावन में पुरवाई चलने से पानी नहीं बरसता, इसलिए उन तालाबों में जो रबी की फसल के लिए सुरक्षित रखे गये हों, तिली का बो देना उचित है।
सावन पछवाँ सींक डुलावे। बरसत मेघ कौन बिलगावे।।
सावन में थोड़ी भी पछवाँ चले तो पानी फिर कौन रोक सकता है ? अर्थात खूब बरसता है।
सावन ब्यारी जब तब कीजे। भादों बाको नाव न लीजे।। / क्वाँर मास के दो पखवारे। जतन जतन से टारो प्यारे।।/ आवे कातिक होय दिवारी। ठेल
सावन में ब्यालू कभी कभी ही करना चाहिए। भादों में उसका नाम नहीं लेना चाहिए। क्वाँर में बहुत संभल कर रहना चाहिए। उसके बाद आधा कातिक बीतने पर, जब दिवाली हो जाय, खूब पेट भर भी ब्यालू करे तो कोई चिन्ता की बात नहीं।
सावन में पुरवैया भादों में पछयाव। / हवारे हर छाँड़ के लरका जाय जिवाव।।
सावन में यदि पुरवाई और भादों में पछवाँ चले तो फिर सूखा पड़ता है। ऐसी अवस्था में किसान को खेती की आशा छोड़ बाल-बच्चों के भरण-पोषण के लिए कोई दूसरा धंधा करना चाहिए।
सावन में ससरारी गये, पूस में खाये पुआ। / चैत में छैला पूछत डोलें, तुम्हरे केतिक हुआ।।
छैल-चिकनिया किसान पर व्यंग्य। सावन में ससुराल गये। पूस में मौज से पुए खाये। इस तरह अपनी खेती तो चौपट कर दी। अब चैत में दूसरों से पूछते फिरते हैं कि तुम्हारे कितना हुआ ?
सावन सुक्ला सप्तमी जो गरजे अघरात। / (तौ) तुम जैयो पिय मालवा, हम जैहें गुजरात।।
सावन में शुक्ल पक्ष की सप्तमी को यदि आधी रात के समय बादल गरजें तो समझना चाहिए कि सूखा पड़ेगा। इसलिए किसी किसान की स्त्री अपने पति से कह रही है कि हे प्रियतम ! उस दशा में अच्छा यह है कि तुम तो मालवा जाना और मैं गुजरात चली जाऊँगी।
सावन सूखै धान। भादों सूखै गोऊँ।।
सावन में पानी न बरसने से धान और भादों में न बरसने से गेहूँ सूखते हैं।
सावन सूखै स्यारी। भादों सूखे उनारी।।
सावन में पानी न बरसने पर खरीफ और भादों में न बरसने पर रखी की फसल को हानि पहुँचती है।