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अक्षर: त

अक्षर 'त' से शुरू होने वाली कहावतें

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तन सुखी, तौ मन सुखी। / तपा तप रये।

भीषण गर्मी पड़ रही है। जून के महीने में जेठ दशहरा से जेठ सुदी 15 पूर्णिमा के दिन तक कहलाते हैं।

तनक कौ मनक करत।

थोड़े का बहुत करते हैं। बात का बतंगड़ बनाते हैं।

तनक सी कानियाँ, सबरी रात।

क़िस्सा तो थोड़ा सा, उसमें सारी रात बिता दी।

तनक सी किल्ली1, नौ मन काजर।

(1-एक छोटा कीड़ा जो ढोरों के शरीर से चिपक कर उनका रक्त चूसा करता है।) साधारण व्यक्ति जब कोई बड़ा आडंबर करे तब कहते हैं।

तपै जेठ तौ बरसा होय भर पेट।

जेठ में खूब गर्मी पड़ने से वर्षा अच्छी होती है।

तब लौं झूँठ न बोलिये, जब लों पार बसाय।

जब तक वश चले तब तक झूठ नहीं बोलना चाहिए।

तबा काँसी बूंद।

शीघ्र नष्ट हो जाने वाली वस्तु।

तबा की तोरी, मटेलनी1 की मोरी।

(1-रोटी रखने का मिट्टी का बना बासन।) तवे पर जो रोटी सिक रही है वह तुम्हारी और जो बन चुकी है वह मेरी। स्वार्थी के लिए।

तरघुना1 से काम परौ।

(1-ऐसा व्यक्ति जो किसी के प्रति अपनी अप्रसन्नता को मन में रखे रहे और उसे प्रकट न होने दे।) तरघुना से काम पड़ा है। ऐसे आदमी से काम पड़ा है, जिसके मन की बात जानना कठिन है।

तरवन से तौ दमार लगी।

तलवों से तो आग लगी है। इसके पीछे एक कथा है। दो व्यक्तियों का अदालत में जमीन का एक मामला चल रहा था और फैसला मुखिया के बयानों पर निर्भर करता था। जिस दिन अदालत में उसकी गवाही होने को थी, उन दो व्यक्तियों में से एक ने उसे प्रसन्न करने के लिए चुपचाप उसके स्वाफ़े में एक अशर्फी बाँध दी। दूसरे व्यक्ति ने ताड़ लिया कि मुखिया को रिश्वत दी गयी है। तब उसने एक के स्थान पर दस अशर्फियां उसके जूतों में रख दीं। हाकिम के सामने गवाही के लिए पहुँचने पर पहिले व्यक्ति ने अशर्फी की ओर मुखिया का ध्यान आकृष्ट करने के उद्देश्य से कहा - "दाऊजू, स्वाफा में कछू लगौ है, झार के देख लओ जाय।" इस पर दूसरे व्यक्ति ने तुरंत कहा- "अरे तुम स्वाफा की लगायें फिरत। उतै तरवन सें तौ दमार लगी।" अर्थात तुम स्वाफा की बात करते हो। वहाँ तलवों से तो आग लगी है। जब किसी मामले-मुकद्द‌में में दो पक्षों में से एक पक्ष के लोग किसी बड़े आदमी या हाकिम को प्रसन्न करके उसे अपने अनुकूल बना ले तब।

तरवन से लग गई।

बात हृदय में गहरी चुभ गयी।

तरवार कौ घाव भर जात, पै बात कौ नई भरत।

तलवार का घाव भर जाता है, पर बात का नहीं भरता।

तरवार मारै एक बेर, अहसान मारै बेर बेर।

तलवार का घाव तो एक ही बार लगता है, और अच्छा भी हो जाता है, परन्तु जब कोई आदमी किसी का उपकार करता है तो वह बार-बार उसका स्मरण कराके उसे दबाता है, जिससे मन को दुःख पहुँचता है।

तरे कौ रोबे नई ऊपर कौ रो रो देय।

अत्याचार पीड़ित तो रोता नहीं, अत्याचारी शोर मचाता है।

तरैं के दाँत तरैं और ऊपर के ऊपर रै गये।

तले के दाँत तले और ऊपर के ऊपर रह गये। अर्थात कुछ बोलते नहीं बना। चुप हो गये।