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अक्षर: स

अक्षर 'स' से शुरू होने वाली कहावतें

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सइयाँ भये कुतवाल अब डर काये को। / सकरें1 देबी सुमरों तोय, मुकर्ते2 खबर बिसर गई मोय।

(1-संकट में। 2-मुक्ति होने पर, संकट से छुटकारा पाने पर।) विपत्ति में सब भगवान का स्मरण करते हैं। बाद में भूल जाते हैं।

सकरे में समदियानो1।

(1-दो समधियों या समधिनों के परस्पर मिलने का दस्तूर। समधी के आगत-स्वागत में होने वाला आयोजन, ज्योनार आदि। समघौरा।) छोटी जगह में कोई बड़ा काम फैलाना।

संकाहूली1 बन में फूली। सास मरी उर नंद झडूली2।।

(1-एक जंगली बूटी, शंखपुष्पी। 2-झडूले बच्चेवाली, अर्थात पुत्रवती। जिस बच्चे का मुंडन-संस्कार न हुआ हो उसे झडूला या झलरा कहते हैं।) कहावत की प्रथम पंक्ति केवल तुक मिलाने के लिए है।

सगी सास मानें ना, धोबिन के पाँव लगें।

पुत्र-जन्म होने पर स्त्रियाँ धोबिन, बसोर आदि के पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं। उसी ओर संकेत है।

संडामर्कट1।

(1-शंड + अमर्क - शंडामर्क। शंड और अमर्क ये दोनों शुक्राचार्य के पुत्र और प्रहलाद के शिक्षागुरु थे। प्रह्लाद को कृष्णनाम लेने से मना किया करते थे।) उग्र और स्वार्थी व्यक्ति।

सत की बाँदी लच्छमी।

लक्ष्मी सत्य से बँधी है। जहाँ सत्य है वहाँ लक्ष्मी रहती हैं।

सतुआ बाँदकें पाछें परबो।

बुरी तरह किसी काम के पीछे पड़ जाना। दम न लेना। दृढ़ संकल्प बनाये रखना।

संतोषी सदा सुखी। / सँदेसन खेती नई होत।

खेती स्वयं देखनी पड़ती है। नौकरों या मजदूरों के भरोसे नहीं होती।

सत्त तौ सातई घरी कौ होत।

सत्य तौ सात ही घड़ी का होता है। अर्थात सत्य की परीक्षा तो थोड़े में ही हो जाती है। अथवा कोई घड़ी दो घड़ी के लिए भी सत्य के कठिन व्रत का पालन कर सके तो बहुत समझो।

सत्तरा बड़ेरे1 करिया करे।

(1-बड़ैरा, घर के छप्पर का ऊपरी हिस्सा।) सत्तरह बड़ैरे काले किये, अर्थात सत्तरह घर बदनाम किये। प्रायः दुश्चरित्र स्त्री के लिए कहते हैं।

सदऊँ कोऊ की नईं रई।

सदा किसी की नहीं रही। किसी का बड़प्पन सदा नहीं बना रहता।

सदा के दुखी, नाव बखतावर। / सदा न फूलै तोरई, सदा न सावन होय। / सदा न राजा रन चड़े, सदा न जोबन होय।।

सदा दिन एक से नहीं रहते। ये बुन्देलखंड के प्रसिद्ध लोकगीत 'अमानसिंह कौ राछरौ' की प्रारंभिक पंक्तियाँ हैं जो कहावत बन गयी हैं।

सदा बेल हरयाय।

सदा बेल हरयाती रहे। ब्राह्मणों की ओर से आशीर्वाद।