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बुंदेलखंड विश्वकोश

अक्षर: अ

अक्षर 'अ' से शुरू होने वाली कहावतें

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अनमाँगें मोती मिलें माँगें मिले न भीख।

बिना माँगे मोती मिलते हैं, माँगने से भीख भी नहीं मिलती। माँगना बुरा है।

अनी1 चूकें हजार बरस की आरबल2।

(1.सं. अणि, अवधि, संकट की घड़ी। 2.आयुर्बल, उम्र।) सिर पर आयी विपत्ति टल जाने पर मानों हजार वर्ष की आयु मिली।

अनोखी नान1, बाँस की नहनी।

(1.नाइन, नाई की स्त्री।) कोई नया अनोखा शौक करने पर।

अन्न तारै, अन्नई मारै।

अन्न से ही जीवन की रक्षा होती है, और अन्न ही प्राण-घातक भी होता है।

अन्‍न-जल की बात है।

अन्न-जल कहाँ ले जाये इसका कुछ ठीक नहीं।

अन्न-धन अनेक घन, सोनो-रूपो कितेक धन।

अन्न ही सच्चा धन है, सोना-चाँदी उसके सामने कुछ नहीं।

अन्न-धन अनेक बन, सोनो-रूपो आधो धन, पूँछ डुलावन कछू नई।

अन्न-धन ही सच्चा धन है, सोना-चाँदी आधा धन है और पूँछ डुलाने वाले गाय बैल आदि-तो उसके सामने किसी गिनती में नहीं।

अपनी अटकें गदा सें दद्दा कनें परत।

गरज पड़ने पर छोटे आदमी को भी हाथ जोड़ने पड़ते हैं।

अपनी अपनी1 जोन में सब सुखी।

(1.योनि, देह, शरीर।) अपनी स्थिति में सब प्रसन्न रहते हैं।

अपनी असल पै आ गये।

अपनी असलियत खोल दी कि हम कैसे हैं।

अपनी इज्जत अपने हाय।

ओछे के मुँह नहीं लगना चाहिए।

अपनी करनी पार उतरनी।

अपने ही हाथ काम पूरा होता है।

अपनी खालें और और की खालें तौ का देओ ?

अपना हिस्सा खा जायें और दूसरे का तो क्या दोगे ?

अपनी जाँघ उघारो, अपनी लाजन मरो।

घर वालों का कोई दोष प्रकट होने से स्वयं ही लज्जित होना पड़ता है।

अपनी टेक भँजाई, बलमा की मूँछ कटाई।

अपनी हठ को पूरा करने के लिए अपनों को हानि पहुँचाने वाले के लिए।

अपनी डाढ़ी कों मुसरका1 पैलें दओ जात।

(1.मलने या मसोसने की क्रिया।) अपनी दाढ़ी पहिले मली जाती है। अपनी विपत्ति टालने का प्रयास पहिले किया जाता है।

अपनी तौ जा देहिया नइँयाँ।

अपनी तो यह देह भी नहीं। संसार में कोई वस्तु अपनी नहीं।

अपनी देरी1 पै कुत्ता नाहर।

(1.देहरी, दरवाजा।) अपने घर पर सभी बलवान बन जाते हैं।

अपनी नाक कटा के दूसरन खों असगुन करबो।

अपनी नाक कटा कर दूसरों को असगुन करना।