अक्षर: अ
अक्षर 'अ' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंअपनी ब्याई कौ का लुवाइयत ?
अपनी विवाहिता स्त्री को लिवाने क्या जाना ? जो वस्तु अपनी है उसे किसी से क्या माँगना ?
अपनी लार तौ सिमटत नइयाँ जगत्तर कौ भारौ बाँदें।
अपनी लार तो सिमटती नहीं, जगत का भार उठाने को तैयार हैं।
अपनी-अपनी परी आन, को जावे कुरयाने कान।
सब अपनी-अपनी मुसीबत में हैं, कुरयाने कौन कहने जाय, अर्थात् कौन दूसरों की फिक्र करे ? कुरयाना। कोरियों का मुहल्ला।
अपनें अटकें सौत के मायके जाने परत।
अपनी गरज पड़ने पर सौत के मायके भी जाना पड़ता है।
अपने आँगें सब कोऊ राजे डाँड़त।
अपने आगे सब राजा को भी दंड देते हैं। पीठ पीछे सब दूसरों को बुरा- भला कहते हैं।
अपनें कान अपने हातन नईं छेदे जात।
1.स्वयं अपने हाथ कष्ट नहीं भोगा जाता। 2.जो काम जिसका है वही करता है।
अपनें चना पराई पौर में नई चबाये जात।
अपने चना दूसरे की पौर में ले जाकर नहीं चबाये जाते।
अपनें दये कौ का लियत ?
दी हुई वस्तु का क्या माँगना ? जो वस्तु अपनी ही है उसका क्या लेना ?
अपनें दाम खोटे तौ परखैये का दोस ?
जब घर का ही आदमी बात न सुने अथवा खोटा काम करे तब दूसरों से क्या कहा जाय ?
अपनें बाप की सौ बहोर लई।
अपने बाप से सौ बार क्षमा मांगी जा सकती है, पर दूसरों के साथ ऐसा नहीं किया जा सकता।
अपनें मठा कों कोऊ पतरो नईं कत।
अपने मठे को कोई पतला नहीं बतलाता। अपनी वस्तु को कोई बुरा नहीं कहता।