अक्षर: क
अक्षर 'क' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंकैंकरे कौ जाव माटी कुकेरत।
केंकड़े का बच्चा पैदा होते ही मिट्टी कुरेदता है। जिसका जो जन्मगत स्वभाव होता है वह नहीं छूटता।
कोऊ गिनें ना गूँथे, मैं लालन की बूआ।
कोई मनुष्य जब जबर्दस्ती किसी विषय में अपनी टांग अड़ाये तब।
कोऊ नाचे कंसउईं, ऊधौ नाचे ऊसउई।
कोई किसी प्रकार नाचे, पर ऊधौ तो उसी प्रकार नाचेंगे, अर्थात अपनी टेक नहीं छोड़ेंगे; बार-बार वही बात कहेंगे।
कोऊ मताई के पेट सें सीक कें नई आऊत।
कोई माँ के पेट से सीख कर नहीं आता। अर्थात करने से ही सब काम आता है।
कोऊ मरें कोऊ मलार गावै।
कोई तो विपत्ति से मर रहा है और कोई मल्हार गाता है। संसार में कोई दुखी है तो कोई सुखी।
कोऊ मरै, कोऊ मोरीं बाँधै।
कोई तो मरता है और कोई उसे जलाने के लिए लकड़ियों का बोझ बाँध कर ले जाता है। संसार की विचित्र गति है।
कोऊ राजा कौ सारो, कोऊ रानी कौ सारो।
कोई राजा का निकट संबंधी है तो कोई रानी का। किसको प्रसन्न किया जाय ? किस किस की बात मानी जाय ?
कोठन कोठन जी दुकाउत।
कोठे-कोठे जी छिपाते हैं। काम से जी चुराते हैं। जिम्मेवारी से भागते हैं।
कोदन की रोटी और कल्लू लुगाई। पानी के मयरे1 में राम की का थराई।।
(1.महेरा, मट्ठे के साथ पकाया गया ज्वार या मक्के का दलिया जिसे गुड़ या नमक-मिर्च के साथ खाते हैं।) कोदों की रोटी, काली-कलूटी स्त्री और मठे की जगह पानी में पका महेरा, भला इसमें भी राम का क्या अहसान ?