अक्षर: क
अक्षर 'क' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंकानी के ब्याव में सौ जोखों।
जिस कार्य के पूरा होने में शंका हो उसमें विघ्न भी बहुत पड़ते हैं।
कानी खों कानोईं प्यारो, रानी खों राजा प्यारो।
अपना आदमी सबको प्रिय होता है।
कानी बिटिया खुटइँ खुटें गई।
कानी लड़की खुटे-खुटे ही अर्थात टोके टोके ही गयी। एक तो काना होना ही बुरा, फिर हर आदमी पूँछता है कि आँख कैसे फूट गयी।
काबुल गये मुगल बन आये बोलन लागे बानी। आब आब कर मर गये खटिया तर रओ पानी।
जब कोई अपने घर में इस प्रकार की भाषा बोले जिसके सुनने के लोग अभ्यस्त न हों तब कहते हैं।
काबुल में का गधानी नई होत ?
काबुल में क्या गधे नहीं होते ? जानकारों में भी मूर्खों की कमी नहीं होती।
काम के न दंद के डेड़ सेर अन्न के।
निकम्मे और निठल्ले व्यक्ति के लिए प्रयुक्त।
काम परे कछ और है काम सरे कछु और। तुलसी भाँवर के परे नदी सिरावत मौर ।।
काम निकल जाने पर आदमी का रुख बदल जाता है।
काम परे पै जानिये जो नर जैसो होय।
काम पड़ने पर ही मनुष्य की पहिचान होती है।
काम प्यारो होत, चाम प्यारो नई होत।
काम प्यारा होता है, आदमी की सूरत शकल नहीं। प्रायः ऐसे व्यक्ति के लिए कहते हैं जो मनोनुकूल काम नहीं करता।
काल करंता आज कर, आज करंता अब्ब। पल में परलै होत है, फेर करेगा कब्ब।।
जिस काम को करना है उसे तुरंत करना ही चाहिए।
काल की काल से लगी।
कल की कल से लगी। आज का काम आज देखो, कल का कल देखा जायगा।