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बुंदेलखंड विश्वकोश

अक्षर: क

अक्षर 'क' से शुरू होने वाली कहावतें

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कानी के ब्‍याव में सौ जोखों।

जिस कार्य के पूरा होने में शंका हो उसमें विघ्न भी बहुत पड़ते हैं।

कानी बिटिया खुटइँ खुटें गई।

कानी लड़की खुटे-खुटे ही अर्थात टोके टोके ही गयी। एक तो काना होना ही बुरा, फिर हर आदमी पूँछता है कि आँख कैसे फूट गयी।

काबुल गये मुगल बन आये बोलन लागे बानी। आब आब कर मर गये खटिया तर रओ पानी।

जब कोई अपने घर में इस प्रकार की भाषा बोले जिसके सुनने के लोग अभ्यस्त न हों तब कहते हैं।

काबुल में का गधानी नई होत ?

काबुल में क्या गधे नहीं होते ? जानकारों में भी मूर्खों की कमी नहीं होती।

काम के न दंद के डेड़ सेर अन्न के।

निकम्मे और निठल्ले व्यक्ति के लिए प्रयुक्त।

काम के नाव बज्जुरवारी चड़त।

काम के नाम से वज्र ज्वर चढ़ता है, ऐसा आलसी है।

काम खों काम सिखा लेत।

काम करने से ही काम करना आ जाता है।

काम परे पै जानिये जो नर जैसो होय।

काम पड़ने पर ही मनुष्य की पहिचान होती है।

काम प्यारो होत, चाम प्यारो नई होत।

काम प्यारा होता है, आदमी की सूरत शकल नहीं। प्रायः ऐसे व्यक्ति के लिए कहते हैं जो मनोनुकूल काम नहीं करता।

काम में काम नई।

काम में काम नहीं। साधारण से काम को बड़ा बताना।

काम सरौ, दुख बिसरौ।

काम निकल जाने पर दुख भूल जाता है।

काया राखें धरम।

शरीर बना रहे तभी धर्म की रक्षा होती है।

कारज धीरें होत है काहे होत अधीर।

धैर्य धारण करने से ही काम बनता है।

कारी कबरी कछू तौ करौ।

अर्थात मुँह से कुछ कहो या करो तो।

कारे कोसन।

काले कोसों, अर्थात बहुत दूर।

काल की काल से लगी।

कल की कल से लगी। आज का काम आज देखो, कल का कल देखा जायगा।

काल की कीनें जानी।

कल क्या होने वाला है इसे कौन जान सकता है ?