अक्षर: क
अक्षर 'क' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंकोरी की भैंस ने कबै पसर1 चरी।
(1.प्रसर, विस्तार, खुला मैदान। डोरों को रात्रि के समय खुले मैदानों अयवा खेतों पर ले जाकर स्वतंत्रतापूर्वक चरने के लिए छोड़ देने को पसर चराना कहते हैं। पसर प्रायः चोरी से ही चरायी जाती है। दूसरों के खेतों की मेंड़ों पर चुपचाप ढोर छोड़ दिये जाते हैं।) कोरी की भैंस में इतना साहस कहाँ जो रात्रि में दूसरों के खेतों पर घास, चरने जा सके ? सीधे और दब्बू मनुष्य से साहसपूर्ण कार्य की आशा व्यर्थ है।
कोरी कें बियाव कड़ेरो1 पर पर जाय।
(1.बाँस की लाठी आदि बेचने वाली एक जाति।) कोरी के यहाँ तो विवाह है और कड़ेरा लोगों की खुशामद करता फिरता है। काम तो किसी का अटका है और चिन्ता दूसरे को है।
कोरी के लरका खों सरगई में बेगार।
कोरी के लड़के को स्वर्ग में भी बेगार। गरीबों और सीधे-सादे लोगों की हर जगह मुसीबत।
कोरी कौ बेगारी कुचबंदिया1।
(1.बुन्देलखंड की एक घुमक्कड़ जाति जो मूँज की रस्सी, सींके तथा कोरियों के काम आने वाले कैंच आदि बना कर जीवन-निर्वाह करती है। ये लोग धीरे-धीरे अब मजदूरी और खेती करने लगे हैं।) कोरी को जब बेपार के लिए किसी की आवश्यकता होती है तब वह कुचबंदिया को पकड़ता है। जैसे को तैसा मिल ही जाता है।
कोरी कौ सुआ का पढ़ै? - तगा-पौनी।
कोरी का तोता क्या पढ़ता है? सूत और पौनी ? जो जिसका धंधा होता है उसके घर में उसी की चर्चा रहती है।
कोलू के बैल कों घरई में पचास कोस की मजल।
कोल्हू के बैल को घर में ही पचास कोस की मंजिल तै करनी पड़ती है। जिसके भाग्य में कष्ट भोगना बदा है, वह घर में भी चैन से नहीं बैठ पाता।
कोलू के बैल को नाहर खाय, अपनी घानी1 उतर जाय।
(1.तिलहन की वह मात्रा जो एक बार में कोल्हू में पेरने के लिए डाली जाती है।) हमारा काम बन जाय फिर चाहे दूसरे की हानि भले ही हो। स्वार्थी व्यक्ति के लिए।
कोस कोस पै पानी बदले, बारा कोस पै बानी।
कोस-कोस पर पानी और बारह कोस पर भाषा बदल जाती है।
कोस-कोस लौं गोड़े धोवे, दो-दो कोस पै खाय। ऐसो बोले भड्डरी, चाय जहाँ लों जाय।।
पैदल यात्रा में थोड़ी-थोड़ी दूर पर शीतल जल से पैर धोने और कुछ खा लेने से थकान दूर होती है।
कौआ कान लै गओ, टटोये तौ दोऊ लगे।
कौआ कान ले गया, टटोले तो दोनों लगे हैं। सुनी-सुनायी बात पर जब कोई दृढ़ विश्वास कर ले तब।
कौआ हाड़ न लैजें।
कौआ हड्डियाँ नहीं ले जायेंगे। मरने पर कहीं ठिकाना नहीं लगेगा।
कौन अकेली तुमाई मताई नेईं सोंठ-बिसवार1 खाई।
(1.सोंठ, पीपल, अजवाइन आदि का मसाला जो गुड़ के साथ प्रसूता को खाने को दिया जाता है।) अकेली तुम्हारी माँ ने ही सोंठ-बिसवार नहीं खायी है, हमारी माँ ने भी खायी है। हम भी कुछ बूता रखते हैं।
कौन इतै तुमाओ नरा1 गड़ो।
(1.नाल, रक्त की नलियों तथा एक प्रकार के मज्जातंतु से बनी रस्सी के आकार की वह डोरी जो एक ओर तो गर्भस्थ बच्चे की नाभि से और दूसरी ओर गर्भाशय की दीवार से मिली होती है। बच्चा पैदा होने पर इसे काट कर अलग कर देते हैं और सूतिकागृह में ही गड्ढा खोद कर गाड़ देते हैं।) तुम्हारी कौन यहाँ नाल गड़ी है? अर्थात तुम्हारा यहाँ क्या हक है? किस बूते पर तुम यहाँ अपने अधिकार की बात करते हो? तुम्हारा तो यहाँ जन्म भी नहीं हुबा।