अक्षर: क
अक्षर 'क' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंकाल के जोगी कलींदे कौ खप्पर।
जब कोई तुच्छ व्यक्ति बड़े आदमियों का अनुकरण करे।
काल कौ भरोसो आज नइयाँ।
कल क्या होगा इसका आज भी ठीक निश्चय नहीं किया जा सकता, फिर पहिले से उसका निश्चय तो और भी कठिन है।
काँसे1 की सुर काँसे मँई रन दो।
(1.एक मिश्रित धातु जो ताँबा और जस्ते के संयोग से मिल कर बनती है; कसकुट। इसके बने बत्र्त्तन थोड़ी सी ठोकर लगने से खनकते है।) काँसे का सुर काँसे में ही रहने दो, अर्थात घर की बात घर में ही रहने दो, बाहर उसको प्रकट करना ठीक नहीं।
किलो फतें कर आय।
किला फतह कर आये। बड़ा भारी काम कर आये। प्रायः व्यंग्य में प्रयुक्त।
की की छाली में बार हैं?
किसकी छाती में बाल है? अर्थात कौन इतना वीर है? प्रायः चुनौती के रूप में प्रयुक्त।
कीनें तुमें पीरे चाँवर दये ते ?
तुम्हें पीले चावल किसने दिये थे ? अर्थात तुम्हें यहाँ कौन बुलाने गया था ?
कुआ की छाँयरी कुआई में रत।
कुएँ की छाया कुएं में ही रहती है। बड़े आदमियों के घर की बात घर में ही रहती है, बाहर नहीं जा पाती।
कुआ की माटी कुअई खों नई होत।
कुआँ खोदने पर जो मिट्टी निकलती है वह कुएँ में ही लग जाती है। जहां का पैसा वहीं खर्च हो जाता है।
कुआ कौ गिरो सूको नई कड़त।
कुएँ में गिरा सूखा नहीं निकलता। बुरा काम करने पर कुछ-न-कुछ बदनामी हो ही जाती है।
कुजाँगा खाता और ससुर बेद्द।
बुरे स्थान पर फोड़ा हुआ है और इलाज करना है ससुर को ! किसी लज्जा- जनक बात को किसी के आगे प्रकट न किया जा सके, पर किये बिना काम भी कैसे चले ?
कुटी दबाई और मुड़ो सन्यासी।
पिसी दवा और मूड़ा सन्यासी (इनको पहिचानना कठिन है।)
कुठिया1 धोएँ काँदो हात।
(1. अनाज रखने का मिट्टी का कुठीला।) कुठिया धोने से केवल कीचड़ हाथ आती है। छोटे आदमी को तंग करने से कोई लाभ नहीं होता।