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अक्षर: क

अक्षर 'क' से शुरू होने वाली कहावतें

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काजर सब कोऊ लगाऊत पै चितवन में फरक होत।

काजल सब लगाते हैं, पर चितवन में फर्क होता है।

काटन लागे चारौ, जैसोइ जेठ तैसोइ बसकारो।

जब घास ही काटने बैठे तो जैसी जेठ मास की कड़ी धूप, वैसी ही वर्षा की झड़ी। जब छोटा काम ही करने लगे तो कष्टों का क्या विचार ?

काटबो छोड़ दओ तौ फूंकारत तौ जाओ।

काटना छोड़ दिया तो फुंकारते तो जाओ, अर्थात थोड़ा-बहुत भय तो दिखाते जाओ !

काटे कटै, न मारें मरै।

किसी वस्तु से किसी प्रकार पिंड न छूटना।

काँटे से काँटो निकरत।

काँटे से काँटा निकलता है। जैसे को तैसा मिल जाय तभी काम चलता है।

काँटे से काँटो बिदो।

काँटे से काँटा बींधा है। मामला अटक गया है। जैसे को तैसा मिल गया है।

काँटो साले करील कौ, उर बदरौटा घाम। लरका साले सौत कौ, उर साजे कौ काम।।

करील का काँटा, बदली का घाम, सौत का लड़का और साझे का काम, ये चारों कष्टदायक होते हैं।

काँठे1 से पूँछ नइयाँ, चेंरिया2 नाव।

(1.जानवर की रीढ़ की हड्डी का वह स्थान जहाँ से पूछ शुरू होती है। 2.वह गाय जिसकी पूंछ का सिरा सुरा गाय की पूँछ के बालों की तरह श्वेत तथा शरीर का रंग उससे भिन्न हो। चॅवरी।) काँठे से तो पूँछ नहीं, फिर भी नाम है चंवरी। नाम के अनुसार गुण नहीं।

काड़-मूँस के कड़आ देय, फूटे घर खाँ तारौ। सारे संगे बहिनी पठवे, तीनऊँ कौ मों कारौ।।

जो कर्ज लेकर कर्ज चुकाये, फूटे घर में ताला दे, और साले के साथ बहिन भेजे, ऐसे तीनों मनुष्य अंत में हानि उठाते हैं।

कातिक जो आँवर तर खाय। कुटुम सहित बैकुंठे जाय1।।

1.कातिक के महीने में आंवला विशेष रूप से पवित्र माना जाता है। कात्तिक-स्नान के दिनों में स्त्रियाँ उसकी पूजा करती हैं और आँवला-नौसी तथा देवोत्थान एकादशी को उसके नीचे भोजन करने जाती हैं।

कातिक भोर दिवारी, ठेलमठेल करै ब्‍यारी।

कातिक बीतने के बाद खूब भर पेट ब्यालू करै तौ भी उससे कोई हानि नहीं होती, क्योंकि रातें बड़ी होने से भोजन पच जाता है।

काँधे कबरा पुटठन सेत, इनके बये जमे ना खेत।

जो बैल कंधे पर चितकबरा और पुट्ठों पर सफेद हो उसके बोये हुए बीज नहीं जमते। तात्पर्य यह कि इस तरह का बैल बड़ा कमजोर होता है और उसके द्वारा जोताई-बोवाई का कार्य सुचारु रूप से सम्पन्न नहीं किया जा सकता। विचार त्याग दिया हो ऐसे व्यक्ति के लिए प्रयुक्त।

कान छिदाय सो गुर खाय।

जो कष्ट उठायेगा उसे आराम भी मिलेगा।

कान में ठेंठे लगा लये।

अर्थात किसी की बात नहीं सुनते। अथवा सब ओर से तटस्थ हैं।

कान-धरी छेरी।

ऐसा मनुष्य जो पूर्णरूप से दूसरे के वश में हो और जो कहा जाय वही करे। प्रायः क्वाँरी लड़की के लिए प्रयुक्त। बकरी का कान पकड़ लेने से वह फिर भागने नहीं पाती।

कानखजूरे कौ एक गोड़ो टूट जाय तौं लूलौ नइँ हो जात।

कानखजूरे का एक पैर टूट जाय तो वह लँगड़ा नहीं हो जाता। बड़े आदमी का यदि थोड़ा बहुत नुकसान हो जाय तो वह उसे नहीं अखरता।

कानी अपनो टेंट1 तौ निहारं नई, औरन की फूली2 पर पर झाँके।

(1.आंख पर का उभरा मांस-पिड। 2.आँख पर का सफेद धब्बा जो चोट लगने अथवा चेचक में आंख के नष्ट होने पर पैदा हो जाता है।) कानी- अपना टेंट तो देखती नहीं, दूसरे की फुली लेट-लेट कर झाँकती है। स्वयं अपना बड़ा दोष न देख कर दूसरे की साधारण त्रुटि को देखते फिरना।

कानी की आँख में कुस गओ, कानी कों मिस भओ।

कानी की आँख में तिनका गया तो उसे बहाना मिल गया कि तिनके से मेरी आँख फूट गयी।